राम

शरणागति

Surrender

Chapter 14 of 14Source scan pages 117–1304 paired passages

Original

Hindi, Sanskrit, and Awadhi

Source: Scans 117 to 121, with the sentence concluding at the opening of scan 122

शरणागति

‘सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’, गीतामें कहे हुए भगवान् श्रीकृष्णके ये वचन उनके परिपूर्णतम, सबके आदि और स्वयं भगवान् होनेकी घोषणा करते हैं। सम्पूर्ण जगत् उनके एक अंशमात्रमें स्थित है। उनके सिवा किञ्चिन्मात्र भी दूसरी वस्तु नहीं है, सारा चराचर जगत् सूत्रमें मणियोंकी भाँति उनमें ही गुँथा है। अतः उनमें आत्मगोपन नहीं है। पर भगवान् राम मर्यादापुरुषोत्तम बनकर आये तब छिपकर मर्यादामें रहे, फिर भी कहीं-कहीं उनका वास्तविक स्वरूप प्रकट हो ही गया। परंतु श्यामसुन्दरमें यह संकोच नहीं।

तत्त्वतः राम और श्याममें कोई अन्तर नहीं है। जो राम हैं, वही श्याम हैं और जो श्याम हैं, वही राम हैं। वैसे ही उनके और रूपोंमें कोई भी अन्तर नहीं है। भेद है केवल लीलाविलासका; परंतु जैसा अपने सम्बन्धमें खुलकर भगवान् श्रीकृष्णने स्पष्ट कहा है, वैसा कहनेमें दूसरे सकुचाते हैं। भगवान् अन्तर्यामी हैं, सर्वज्ञ हैं, त्रिकालज्ञ हैं, उनसे कोई बात छिपी तो है नहीं। उन्होंने अर्जुनके सामने बहुत गोपनीय रहस्योंका उद्घाटन किया और अपने स्वरूपको प्रकट किया तथा कहा, ‘सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।’ इस भगवद्वाणीमें धर्मोंके त्यागकी बात नहीं, अपितु धर्मोंके आश्रयके त्यागकी बात है और मात्र एक आश्रय ग्रहण करनेकी, प्रेम करनेकी बात है:

एक धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा॥

भगवान् श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि सब धर्मोंको छोड़ दो और सब धर्मोंका आश्रय छोड़कर, सबका परित्याग कर ‘मामेकं शरणं व्रज’, एकमात्र मेरी शरण हो जाओ। तथा ‘मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु’, मन दे दो। मन दे दिया तो सब दे दिया। फिर यदि कहो कि मन तो दे दिया, लेकिन नाथ, तनसे मेरी सेवा करो। यहाँ सेवाका अर्थ है भजन और भक्तिका अर्थ है सेवा। सर्वात्म-समर्पणपूर्वक अपने इष्टदेवके मनोऽनुकूल आचरणवाला जीवन बन जाय तो इसीका नाम भक्ति है। मेरे भक्त बनो। ‘मद्याजी’ का मतलब है कि केवल मेरी पूजा करनेवाले बनो।

तात्पर्य यह कि जिससे सब निकले तथा जो सबमें व्याप्त है, ‘येन सर्वमिदं ततम्’, उस व्यापक भगवान्‌की पूजा करो। भाव यह कि वह व्यापक भगवान् मैं ही हूँ और कोई नहीं है। इसलिये बिना संकोच स्पष्ट कह दिया कि मेरी पूजा करो। मेरी पूजा करनेवाले बनो। हाथ जोड़ना हो, नमस्कार करना हो, दण्डवत् करना हो तो मुझे ही करो।

देखो, भगवान् श्रीकृष्णने ऋषियोंके द्वारा पूजा भी स्वीकार की, स्वयं पूजा करते भी रहे। अर्थात् सारे ‘इदम्’ को अपनेमें समेट लिया: यह भी मैं, वह भी मैं। जिसको, जिस आत्माको ‘अहम्’ कहते हैं, उसे ‘सः’ भी कहते हैं, अर्थात् वह भी मैं। जो ‘इदम्’, यह, दीखता है वह प्रपञ्च भी मैं। मेरे सिवा कुछ है ही नहीं। मैं ही खेलता हूँ और अपनेमें ही खेलता हूँ। मैं श्रीकृष्ण श्यामसुन्दर नटवर-वपु-रूपमें नये-नये स्वाँगोंमें खेलता हूँ। यह है भगवान्‌की लीला, परमगोपन और सर्वविदित। यह सर्वगुह्यतम है, ‘सर्वगुह्यतमम्।’

भगवान्‌का रहस्य तो केवल भगवान् ही जानते हैं। अन्य जो भी जाननेका अभिमान करते हैं, वे सब अज्ञानी हैं। इस ‘सर्वगुह्यतमम्’ का तात्पर्य यह है कि भगवान् चाहते हैं, कहते हैं कि मेरे साथ यदि किसीको प्रीति करनी हो, मुझसे यदि किसीको प्रेम करना हो तो जगत्‌के सारे कर्तव्य-अकर्तव्योंसे ऊपर उठना पड़ेगा। जगत्‌के सारे भयोंसे और सारी आशाओंसे मुक्त होना पड़ेगा। जगत्‌की सारी क्रियाओंसे, अक्रियाओंसे अलग होना होगा। अर्थात् क्रिया और अक्रिया दोनोंमें उनका पूजन, त्याग और भोग दोनोंसे उनका पूजन, छोड़ने और करने दोनोंसे उनका पूजन। तात्पर्य, उसके सिवा जीवनमें अन्य कुछ भी न हो तो अपना है तथा न कोई प्राप्तव्य है और न ही कुछ करने योग्य कार्य है। प्राप्त करने योग्य वस्तु, सेवन करने योग्य वस्तु है तो बस एकमात्र परम प्रेमास्पद भगवान्, अर्थात् मैं।

भगवान्‌के प्रति ऐसा समर्पण जब हो जाता है, तब उस प्रेम-राज्यमें तरंगित रहता है केवल प्रेम-समुद्र। जहाँ उसका तल है वहाँ तो वह सर्वथा प्रशान्त है। वहाँपर न विक्षोभ है, न तरंग है, न लहरियाँ हैं। परंतु वह समुद्र अत्यन्त प्रशान्त है और महासागर है, इतना विलक्षण है कि उसी सागरमें अनवरत नित्य नव-नव तरंग-मालाएँ नाचती रहती हैं। वह जैसे शान्त है ठीक उसी प्रकार वह नाचनेवाला भी है। जैसे अनन्त है उसी प्रकार अन्तकी लीला करनेवाला भी है। जिस प्रकार अगाध है, उसी प्रकार छलकनेवाला भी है। जिस प्रकार निःस्तब्ध है, उसी प्रकार महान् शब्द करनेवाला भी है। युगपत्-विरुद्ध-धर्माश्रयत्व जिसमें रहे उसका नाम है भगवान्। इसका संकेत उपनिषदोंमें, वेदोंमें सर्वत्र है, ‘अणोरणीयान् महतो महीयान्।’

यह विषय बुद्धिग्राह्य नहीं है। बुद्धिमें ब्रह्म आता नहीं, आ सकता नहीं। यह ‘बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्’ है, अर्थात् बुद्धिग्राह्य नहीं, अतीन्द्रिय है। बुद्धि-ग्राह्यका अर्थ केवल इतना है कि बुद्धि समझती है कि यह अतीन्द्रिय है। बुद्धि केवल उसकी अतीन्द्रियताका परिचय प्राप्त कर पाती है, उसके स्वरूपका नहीं। यदि प्रकृतिसे उत्पन्न बुद्धि उस ब्रह्मके स्वरूपका आकलन कर ले, उस बुद्धिमें वह रूप समा जाय, यद्यपि यह सर्वत्र सब जगह समाया हुआ है, पर बुद्धिमें ठीक-ठीक समा जाय, तब बुद्धिजन्य हो सकता है। परंतु श्रुतियाँ कहती हैं, ‘यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह’, जहाँसे यह वाणी, मन, बुद्धि तथा चित्त सब लौट आते हैं। उसके वास्तविक स्वरूपको समझकर वर्णन करते हैं, यह भी वह नहीं, यह भी वह नहीं, यह भी वह नहीं, तब फिर उसका आकलन कौन करे? उसे कौन बताये? वह किसकी वाणीमें आये?

वहाँ तो ऐसा निर्देश प्राप्त होता है कि इस प्रकार जो तत्त्व है वह तत्त्व ही जहाँपर अपना बनकर अपने गुणोंको प्रकट करता है, अपने गुणोंका अवतरण कर लीलाविलासमें प्रवृत्त होता है, उस परमतत्त्वका नाम श्रीकृष्ण। वैष्णवोंके दर्शनको देखनेसे ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने बड़ा विचार किया है। विचारकी धारा अलग और विचारकी दृष्टि अलग रखकर उन्होंने आह्लादिनी, सन्धिनी और संवित्, इन तीन शक्तियोंका विवेचन किया है। विष्णुपुराणमें यह सन्दर्भ प्राप्त है। आह्लादिनी शक्ति भगवान्‌का नित्य आनन्दमय स्वरूप है। वह आनन्द ही, वह आह्लाद ही नित्य-निरन्तर श्रीविग्रहके रूपमें प्रकट है, हुआ नहीं, अपितु नित्य-प्रकट है, नित्य उद्वेलित है, नित्य उच्छलित है, नित्य लीलापरायण है। वह आनन्द शान्तानन्द ही नहीं, उच्छलितानन्द भी है। नर्तनानन्द भी है, संगीतानन्द भी है, विरहानन्द भी, मिलनानन्द भी है। इस प्रकार वह आनन्द-आह्लाद जहाँ प्रत्यक्ष प्रकट है, उस प्रकट आह्लादके श्रीविग्रहका नाम है राधा।

ये जो लीला-धाम हैं, ये जो लीला-परिकर हैं, ये सब-के-सब संवित्-शक्ति हैं। भगवान्‌की स्वयंकी चिति-शक्तिद्वारा इन सबका प्रादुर्भाव होता है। जो सत्-शक्ति है, वही शक्ति लीलाके रूपमें प्रकट होती है। लीला-परिकर, लीला-स्थान, लीला और लीलाका प्रधान पात्र भी वही है। अब प्रश्न आता है, श्रीगोपांगनाएँ क्या हैं? ये श्रीराधाकी कायव्यूह-रूपा हैं। राधा हैं श्रीकृष्णका अभिन्न स्वरूप आनन्दांश और राधाके शरीरसे, राधाके श्रीविग्रहसे जिनका प्राकट्य हुआ, वे सब-की-सब हैं गोपांगनाएँ, राधाकी कायव्यूहस्वरूपा। नित्य-निरन्तर लीलाधाममें प्रकट जो महारास है, महालीलाविलास है, उसमें इन कायव्यूहरूपा श्रीगोपांगनाओंका नित्य स्थान है। उनके साथ ही नये-नये साधनसिद्ध महात्मा लोग श्रीगोपांगनाओंका स्वरूप प्राप्त करके उस लीलामें सम्मिलित होते रहते हैं। जो इस मार्गके अन्वेषक हैं, अनुसन्धानकर्ता हैं, साधक हैं, अनुशीलन करनेवाले हैं, वे साधनसिद्धा गोपियोंके रूपमें नित्य-सिद्ध हो जाते हैं, नित्य-पार्षदत्वको प्राप्त हो जाते हैं। तथापि इन सबके मूलमें हैं राधा।

यह लीलाविलास है सच्चिदानन्दका लीलाविलास। इस लीलाविलासकी प्रधान नायिका हैं श्रीराधाजी। उन राधाजीमें जहाँ-जहाँपर जिस-जिस रसका जब-जब उन्मेष होना आवश्यक है, वह अविराम होता रहता है। प्रकटतः उसके आठ रूप माने गये हैं। पहला रूप है व्यापक, उसका नाम है प्रेम। इस प्रेम का स्तर है श्रीकृष्ण-रूप-वृत्ति। ‘प्रेम’ केवल पारिभाषिक नाम है। इस वास्तविक प्रेमका स्वरूप है स्नेह। यह वह स्नेह नहीं जैसा अपनी प्रचलित भाषामें अपनेसे छोटोंके प्रति होता है, अपितु यह स्नेह उसी पवित्र प्रेमका एक परिष्कृत रूप है। स्नेहके बाद तीसरा रूप होता है मान। मानका नाम सुनकर डर जाते हैं लोग, परंतु यह वह मान नहीं। श्रीकृष्णके सुरत-संवर्धन-हेतु प्रकट वक्रता ही यह मान है। चौथा रूप होता है प्रणय। प्रणयके बाद पाँचवाँ रूप होता है राग। छठा अनुराग, सातवाँ स्तर रूप ग्रहण करता है भावका और आठवाँ स्वरूप होता है महाभाव। ये भाव और महाभाव दोनों प्रायः एक ही हैं, परंतु भावका जहाँ पूर्ण विकास है, गोपीभावकी जहाँ राधाभावमें परिणति है, वह है महाभाव। उस महाभावमें फिर दो विलक्षण स्थितियाँ और प्रकट होती हैं, जिनके प्रेमशास्त्रके अनुसार नाम हैं मादन और मोदन, राधाका मादनाख्य भाव और राधाका मोदनाख्य भाव।

इसकी भी बड़ी उज्ज्वल पवित्रतम व्याख्या है। मादनाख्य भावमें अपनेमें महान् दैन्यका अनुभव होता है। इसका यत्किञ्चित् निर्देश प्राप्त होता है। एक लीलामें श्रीकृष्ण चले गये मथुरा। जानेके बाद श्रीराधा समझती हैं कि अब कुछ भी शेष रहा नहीं। श्रीकृष्ण तो अब मिलनेके नहीं। फिर भाव आता है कि अब तो केवल अँधेरा ही रह गया। मुझे जीना नहीं है, जी सकती ही नहीं। पर एक अवलम्बन अवश्य मिल गया है, श्रीकृष्णका कृष्णापन। काला रूप जो है वह उन्हींकी तो छाया है। अन्धकार-ही-अन्धकार चारों तरफ दीखता है, उस अँधियारेमें भी प्रतिभासित है श्रीकृष्णकी ही छाया।

पूर्वरागके समयकी एक बात है। एक बार श्रीराधा श्रीकृष्णतक नहीं पहुँच सकीं, कई तरहके विघ्न थे, बाधा थी। परंतु कालिमाकी छायामें जाकर श्रीराधाने श्रीकृष्णका अनुभव कर लिया। परंतु फिर दूसरी वृत्ति मनमें आयी। विचार करने लगीं कि छाया होती तो पड़ती। वे तो हैं नहीं और मेरे इस वियोगकी ज्वालासे सूर्य-चन्द्रमा भी जल गये, वे दोनों नहीं रहे। फिर छाया जिन सूर्य-चन्द्रमाके आधारसे पड़ती है वह स्थिति भी नहीं है। अब तो बच गया है अन्धकार, रह गयी है अँधियारी, निशा याद दिलानेवाली है। अतः यह कालापन ही मेरे जीवनका आधार रह गया है। अब तो इसीको लेकर मैं जीऊँगी।

उसके बाद दैन्य जब और फूटता है, तब भगवान्‌से प्रार्थना करती हैं। ध्यान देनेकी बात है, श्रीराधा एवं गोपांगनाओंके लिये श्रीकृष्ण तो भगवान् हैं नहीं। वे परम प्रेष्ठ हैं, प्रियतम हैं, प्राणाधार हैं। प्रार्थना होती है प्रभुकी, श्रीमन्नारायणकी। वे जगदाधारसे प्रार्थना करती हैं, हे भगवान्, मेरी मनःकामना पूर्ण करें, प्रभो। जिस ओर मैं जाना चाहती हूँ, उससे विरुद्ध मेरा एक पैर भी न टिके। किस ओर जाना चाहती हैं, यह भी स्वयं ही बताती हैं। वे कहती हैं, मेरे कलेवरका तापमान बढ़ता चला जा रहा है। शरीरका, मनका तापमान इतना बढ़ता जा रहा है कि वह पास आनेवालेको भी जला देगा। अतः श्रीकृष्ण जिस दूर देशमें हैं, हे भगवन्, मुझे उससे विरुद्ध देशमें ले चलो। श्रीकृष्णके समीपमें मैं न पहुँचूँ कभी। मुझे दूर ले चलो और दूर-से-दूर ले चलो। यदि कहीं मैं मार्ग भूल गयी, श्रीकृष्णकी ओर चल पड़ी और उनके समीप पहुँच गयी तो मेरे तापमानसे, मेरे शरीरकी गर्मीसे वायु उत्तप्त हो जायगी। पवन उत्तप्त हो जायगा और वह उत्तप्त पवन उस नील कलेवरको झुलसा देगा। अतएव हे नारायण, यह कदापि न घटे। मैं विपरीत चलूँ, दूर चलूँ। यही रुचिकर है।

English translation

Source: Scans 117 to 121, with the sentence concluding at the opening of scan 122

Surrender

Kṛṣṇa's words in the Gītā, “Abandoning all dharmas, take refuge in me alone,” proclaim him to be the fullest manifestation, the origin of all, and God himself. The whole universe abides in only a fraction of him. Nothing exists apart from him; all moving and unmoving beings are strung upon him like jewels on a thread. Rāma, appearing as the supreme exemplar of righteous limits, concealed his divinity within those limits, though his true nature sometimes shone forth. Śyāmasundara shows no such reserve.

In truth there is no difference between Rāma and Śyāma, nor among the Lord's other forms; only their līlās differ. Kṛṣṇa spoke more openly about himself. As indwelling Lord, omniscient and knower of all three times, he disclosed the most secret mysteries to Arjuna. His command does not mean abandoning dharma itself, but relinquishing reliance upon all dharmas and accepting one sole refuge in love. “One dharma, one vow and rule: with body, speech, and mind, love the husband's feet.” Kṛṣṇa says to relinquish every other support and take refuge in him alone. “Fix your mind on me, become my devotee, worship me, bow to me.” Give the mind, and everything has been given. Bhakti is a life wholly surrendered and governed by conduct pleasing to the chosen Lord. To become his devotee is to serve; to become his worshipper is to worship him alone.

Worship the all-pervading Lord from whom everything arises and by whom all is pervaded. Kṛṣṇa declares that he himself is that Lord. He accepts worship from sages and also performs worship, encompassing every “this” and “that” within himself. The inward “I,” the transcendent “he,” and the visible world of “this” are all he. He alone plays, within himself, through Śyāmasundara's ever-new dramatic forms. This līlā is at once supremely concealed and universally known, the most secret of all secrets.

Only God knows God's mystery. To love him, one must rise above the world's notions of duty and non-duty, fears and hopes, action and inaction. Action and inaction, renunciation and enjoyment, doing and leaving aside must all become his worship. Nothing remains in life except the supremely beloved Lord, the only reality to attain and cherish.

With such surrender, only the ocean of love moves through the kingdom of love. In its depth it is utterly tranquil, without agitation or wave, yet upon that very ocean ever-new garlands of waves dance eternally. It is tranquil and dancing, infinite and sporting with finitude, unfathomable and overflowing, silent and resounding. God is the ground in which contrary qualities coexist. The Vedas and Upaniṣads point toward this in the phrase “smaller than the smallest, greater than the greatest.”

This reality cannot be grasped by intellect. The intellect can know only that Brahman transcends the senses, not Brahman's essential nature. The revealed texts say that speech and mind return from it without reaching it. If every description ends in “not this, not this,” who can measure or express it? When that supreme reality manifests its own qualities and enters the play of līlā, it is called Śrī Kṛṣṇa.

Vaiṣṇava thought describes three powers: āhlādinī, sandhinī, and saṁvit. Āhlādinī is God's eternal blissful nature. Bliss is eternally manifest, surging, overflowing, and devoted to līlā. It is tranquil bliss and exuberant bliss, the bliss of dance and music, separation and union. The embodied form in whom that bliss is directly manifest is Rādhā. The līlā realm and its companions arise through divine consciousness. The eternal power of being manifests as the līlā, its place, companions, and central participant. The gopīs are bodily expansions of Rādhā, who is Kṛṣṇa's inseparable bliss aspect. In the eternally manifest great rāsa, perfected aspirants also receive the form of gopīs and enter the līlā as eternal companions, yet Rādhā remains the source of all.

Rādhā is the principal heroine of this play of being, consciousness, and bliss. Love's rasa continually unfolds in her through eight forms: prema, sneha, māna, praṇaya, rāga, anurāga, bhāva, and mahābhāva. Prema is the all-pervading disposition that takes the form of Śrī Kṛṣṇa. Sneha is its refined tenderness. Māna is not ordinary offended pride but a subtle crookedness that increases Kṛṣṇa's delight in love. Praṇaya, rāga, anurāga, and bhāva follow. When gopī-bhāva reaches its complete culmination in Rādhā-bhāva, it is mahābhāva. Within it manifest the extraordinary states called mādana and modana.

Mādana includes profound self-abasement. When Kṛṣṇa leaves for Mathurā, Rādhā feels nothing remains and life is impossible. Yet darkness becomes a support, for its blackness appears as Kṛṣṇa's shadow. In an earlier līlā, prevented from reaching him, she had experienced him within a dark shadow. Now she reflects that a shadow requires the sun or moon, but the fire of separation has consumed them both. Only darkness remains to recall him, and she will live by it.

As humility deepens, she prays not to Kṛṣṇa as God, for to Rādhā and the gopīs he is the supreme beloved and life itself, but to Lord Nārāyaṇa, support of the universe. Her fever of separation burns so intensely that she fears the nearby air will become hot and scorch Kṛṣṇa's blue body. She therefore begs Nārāyaṇa to carry her ever farther from the country where he lives, lest she mistakenly approach him and cause him pain. Her sole desire is his happiness, even through limitless distance from him.

Original

Hindi, Sanskrit, and Awadhi

Source: Scans 122 to 125

यहाँ मादनाख्य दैन्यका भाव है, इसीलिये वे कहती हैं कि मैं दूर जाना चाहती हूँ, जिससे मेरे उत्तप्त अंगोंका स्पर्श पाकर अति उत्तप्त वायु मेरे प्राणनाथके नील कलेवरका स्पर्श न कर सके और वह सुखसे रहें। दूसरी भावना जब मनमें आती है, तब वे विचार करने लगती हैं: मैं जब चलती थी तो मेरे पीछे-पीछे भ्रमरोंका दल चलता था, गुनगुनाता हुआ, गुंजार करता हुआ। तब मुझे लगता था कि ये भौरे क्यों उड़ रहे हैं, ये भौरे मेरे पीछे क्यों चल रहे हैं। उत्सुकतावश पीछे एक दिन मुड़कर देखा, श्यामसुन्दर मेरे पीछे-पीछे चल रहे थे। श्यामसुन्दरका वह कलेवर दिव्यगन्धयुक्त है, नित्य सौरभित है। दिव्य-कमलगन्ध-पूरित उस गन्धको पानेके लिये ही ये भौरे उड़ते चले जा रहे थे। इसीसे मैं यह समझती थी कि श्यामसुन्दर मेरे साथ हैं और मुझसे उनको सुख मिल रहा है। उसी सुखानुभूतिसे भौरे गुनगुना रहे हैं, पर अब तो श्यामसुन्दर चले गये। वे ही तो मेरे जीवनके जीवन थे।

जीवन्तता हो तो शरीरको सुवासित करती है, दुर्गन्धसे बचाये रखती है। जीवन गया, कुछ ही क्षणोंमें शरीर सड़ने लगता है, दुर्गन्धयुक्त हो जाता है। श्रीराधाके मनमें भावना आती है: मेरे शरीरके जो प्राण थे, वे तो छोड़कर चले गये, अब तो केवल ढाँचा रह गया है, वही चलता है। पर जब प्राण निकल गये तो शरीर अब दुर्गन्धयुक्त हो गया, सड़-गल गया। हे भगवान्, हे नारायण, मुझपर कृपा करो कि मैं अपने श्यामसुन्दर जहाँ हैं, उससे इतनी दूर रहूँ, इतनी दूर रहूँ कि मेरे दुर्गन्धयुक्त शरीरकी वायु भी उनका स्पर्श न कर सके, उन्हें दुःखी न बना सके। मुझे दूर रहना है, अतः मुझे दूर ले चलो।

फिर एक नवीन उद्भावना आयी। मेरे श्यामसुन्दर मुझको छोड़कर चले गये। यह बड़ा ही सुन्दर हो गया। वही हो गया जो मैं चाहती थी। भगवान्‌ने मेरी इच्छा पूर्ण कर दी। मैं नितान्त अयोग्य, नितान्त अनधिकारिणी, सर्वथा दुर्गुणवती, सर्वथा कुरूपा, सर्वथा कुलक्षणवाली हूँ। श्यामसुन्दर मुझपर, सिर्फ मुझसे प्रेम करें और इसको अपना सुख मान लें, यह तो उनका सर्वथा भ्रम था। मैं भगवान्‌से प्रार्थना किया करती थी: भगवान्, मेरे प्रियतम श्यामसुन्दरका भ्रम आप मिटा दें और किसी प्रकार ये मेरा परित्याग कर दें। मैं उनसे प्रार्थना करती, समय-समयपर अपने प्राणनाथसे निवेदन भी करती, नाथ, यह दुःख वरण करना आप छोड़ दीजिये। उन्हें समझाती कि मेरा यह साहचर्य तो आपके लिये दुःखरूप ही है, पर इसे मान रहे हैं आप अपना सुख, क्योंकि मुझमें आपकी आसक्ति-अनुरक्ति है। अतएव आप कृपा करके अपने इस भ्रमका निवारण करें। बहुत अधिक अधिकारिणी देवियाँ हैं, गुणवती, शीलवती, सब तरहसे मुझसे सुयोग्य। आप उन्हें स्वीकार कर लें।

जब-जब मैं यों कहती, तब-तब श्यामसुन्दरका मेरे प्रति अनुराग और बढ़ता चला जाता। तो मैं विचारमें पड़ गयी कि अब मैं क्या करूँ? कहती हूँ तो इनका अनुराग और बढ़ता है, आसक्ति और बढ़ती है और इस कारण इनका दुःख ही बढ़ता है, प्रकारान्तरसे। और नहीं कहती हूँ तो इनके दुःखको मैं देख नहीं सकती। इनका दुःख कैसे मिटे? मेरे परित्यागसे मिट सकता है। मुझे ये त्याग दें तो इनका दुःख मिट जायगा। मैं तो इस त्यागके लिये तैयार हूँ ही। नारायणने मेरी प्रार्थना सुन ली, देवने मेरी प्रार्थना सुन ली, इसलिये अक्रूर इन्हें मथुरा ले गये। जब ले गये तो वहाँ जाकर इनको योग्य अधिकारिणी कोई प्राप्त भी हो गयी होगी। मेरी इन्हें विस्मृति भी हो गयी होगी और मेरी विस्मृति उनके लिये सुखदायिनी होगी ही। आज मेरी साध पूरी होगी। यह प्रिय-सुख-सम्पादनके भावकी पराकाष्ठा।

जीवमात्रकी यह दशा है कि अगर जरा-सा मनके अनुकूल भगवान् न करें तो भगवान्‌पर नाराज हो जाते हैं। हम अधिकांश भजनवाले लोग भगवान्‌को भजते ही इसलिये हैं कि भगवान् हमारे लिये अनुकूलता उत्पन्न करते रहें, स्वयं भी, पदार्थोंके द्वारा भी। हमारी इच्छाओंको भगवान् पूर्ण करते रहें, इसलिये भी हम भगवान्‌को भजते हैं। उस भजनके बदले हमें भगवान् अधिक सुख दे दें, दुःख तो बिलकुल दें ही नहीं। यदि दुःख प्राप्त हो, तब तो फिर भगवान्‌की आवश्यकता रहती ही नहीं। पग-पगपर नित्य-निरन्तर स्वयंको उपासक माननेवाले लोग, भगवान्‌की भक्ति करनेवाले जो अपनेको ‘हम’ मानते हैं ऐसे लोग, अपनेको विरक्त माननेवाले लोग, जहाँ-कहीं भी प्रतिकूलता देखते हैं, जहाँ-कहीं भी जरा-सी मान-भंगकी स्थिति आती है, केवल विचारमात्र आता है कि किसीने हमारा आदर नहीं किया, हम भगवान्‌को कोसने लगते हैं। यह बड़ा विचारणीय प्रश्न है। इस विष्ठा-मूत्रादिसे भरे शरीरमें कौन-सी बढ़िया चीज भरी है, जिसको लेकर हम अभिमान करें? इस शरीरको लेकर हम यह कहें कि हम कुछ बड़े हैं, हमारे अन्दर कोई महत्त्वका पदार्थ है, यह बड़े ही सोचका विषय है। इस शरीरका जहाँ-कहीं सम्मान नहीं हुआ, आराम नहीं मिला और इस शरीरके कल्पित नामकी जहाँ पूजा नहीं हुई, हम भगवान्‌को कोसने लगते हैं। उन लोगोंको असभ्य मानते हैं, असंस्कारी मानते हैं, प्रेमी नहीं मानते, सत्संगी नहीं मानते।

तात्पर्य इतना ही है, जब कभी अपनी वासनाकी पूर्तिका प्रश्न आये, वहाँ वासना-पूर्तिका आयोजन हो नहीं तो हम वैपरीत्यका अनुभव करने लगते हैं। प्रवचन करना चाहें और सफलता न मिले तो मनमें आता है कि यहाँ तो कोई सत्संगकी बात जाननेवाला है ही नहीं, कोई प्रेमी है ही नहीं। यहाँपर तो सब-के-सब रूखे लोग हैं, सब भोगोंमें लगे हैं, कोई भी सत्संगकी बात नहीं करता। इन्होंने समय देकर सत्संग नहीं किया, ये सब असत्संगी क्यों हैं, अप्रेमी क्यों हैं, रूखे क्यों हैं, इनमें सभ्यता क्यों नहीं, इन सबका एक ही उत्तर है: इन्होंने हमारा मान नहीं किया और हमें मानकी भूख थी। यही हमारे दुःखका कारण बन गया। यदि हम अपनी बात भगवान्‌को सुनाते होते तो दूसरी चीज होती।

एक बारकी बात है, तानसेन बड़े संगीतज्ञ थे। अकबरके सामने एक बार उन्होंने मल्हार राग गाया। अकबर उसे सुनकर विह्वल हो गया और बोला, तुमने कहाँ सीखा? इतना बढ़िया कोई गा नहीं सकता। तानसेनने उत्तर दिया, महाराज, मैं तो कुछ नहीं गा सकता। मेरे गुरुजी हरिदासजी महाराज जैसा गाते हैं वैसा तो आपने कभी सुना ही नहीं होगा। मैं तो उनके सामने सूर्यके सामने जुगनू-जैसा हूँ। अकबरने कहा, उनका गायन सुनाओ। तानसेनने उत्तर दिया, उनका गायन सुनाना हमारे हाथमें थोड़े ही है, आपके हाथमें थोड़े ही है कि आप चाहें उनको बुलावा भेजें और वे आपके दरबारमें आ जायँ। ऐसे तो वे हैं नहीं। अकबरके मनमें उत्सुकता जग गयी थी। उसने कहा, क्या उपाय करें? सुनना तो है। तानसेनने सुझाव दिया, थोड़ी देरके लिये बादशाहियत भूल जाइये। सादे कपड़े पहनकर वास्तवमें साधारण आदमी बनकर हमारे साथ चलिये, तब कोई व्यवस्था करेंगे। सुननेकी इच्छा थी अकबरकी, अतः जैसा तानसेनने कहा वैसे ही वेश बदलकर कुटियाके पास पहुँचे। तानसेनने कहा कि पेड़के नीचे बैठ जाइये अलग। अकबरको समीप ही पेड़के नीचे कुटियाके बाहर बैठा दिया और स्वयं अन्दर गये।

हरिदासजी अपने भगवान्‌की प्रेम-समाधिमें मस्त थे। कुछ देरके बाद उनकी प्रेम-समाधि टूटी। बोले, “तानसेन, अच्छे हो? कैसे आ गये?” तानसेनने उत्तर दिया, “महाराज, ऐसे ही आ गया। उस दिन जो राग आपने सुनाया था, वह मुझे ठीक याद नहीं रहा, मैं फिर सुनना चाहता हूँ।” बोले, “सुनो, लाओ एकतारा।” लिया एकतारा और लगे सुनाने। उसके प्रभावसे अकबर भावविभोर होकर मूर्छित हो गये। उनको जो चीज आज श्रवण करनेको मिली, वैसी जीवनमें बड़े-बड़े गवैये, बड़े-बड़े संगीतज्ञ, कलाविद्, अच्छे कण्ठवाले आये, पर ऐसा सुख नहीं मिला जैसा आज प्राप्त हुआ। अकबरको चेत हुआ। अकबरने कहा, “तानसेन, तुम बड़े गवैये हो, तुम ऐसा क्यों नहीं गाते, क्या बात है?” तानसेनने उत्तर दिया, “महाराज, बात यह है कि वे सुनाते हैं भगवान्‌को और मैं सुनाता हूँ आपको। यही अड़चन है।” बुलासा, बोली निकालना, अलग चीज है और भगवान्‌का गुणगान करना और चीज है।

तुलसीदासजीने इतना बड़ा ग्रन्थ रचा, पर भूमिकामें कहते हैं, ‘स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा।’ स्वान्तः सुखाय। इसके द्वारा इस बहते हुए अमृतसे कोई लाभ उठा ले, कोई नहा ले, यह अलग बात है, पर मेरा ग्रन्थ ऐसा हो, इससे जगत्‌का उपकार हो, भला हो, इस प्रकारकी किसी वासनाको प्रेमी संत नहीं रखते। उनका सम्बन्ध तो रहता है अपने भगवान्‌से। वे अपने भगवान्‌के सामने कभी रोते हैं, कभी गाते हैं, कभी उनका गुणानुवाद करते हैं, कभी चरित्र गाते हैं। ठीक यही स्थिति यहाँ भी है। इस पिंजरेमें बैठे पक्षीके गानको कोई उड़ता हुआ पक्षी सुन ले और याद कर ले वह अलग चीज है, पर यह तो अपने पिंजरेमें आबद्ध है, अपने भगवान्‌को अपने अन्दर लिये हुए, उसीको सुनाता है। जहाँपर वासना मनमें है, वहाँपर जरा-सी भी अनुकूलता नहीं दिखती, मान नहीं दीखता तो हम भले लोगोंको भी कह देते हैं कि बुरे लोग हैं, असंस्कारी हैं, असभ्य हैं, हमारा इन्होंने मान नहीं किया, हमारी बात सुनी नहीं। यह ठीक है, यदि कोई सुनाने जाय और उसकी बात न सुनें तो दुःख होगा। होना स्वाभाविक है। इसमें उनका कोई अपराध नहीं है। पर ये प्रेमी भक्त दुनियाँको सुनाने नहीं जाते।

‘सर्वधर्मान् परित्यज’ भी यही है। अर्जुन दूसरे क्षेत्रमें था। इसलिये भगवान्‌को उसके द्वारा जो काम करवाना था वही करवाया, यन्त्रवत्।

English translation

Source: Scans 122 to 125

Rādhā's wish for distance expresses the humility of mādana. She fears that air heated by her burning limbs might touch and hurt her beloved's blue body. She then remembers swarms of humming bees that once followed her. Turning back one day, she saw Śyāmasundara walking behind her. The bees sought the eternal fragrance of divine lotuses emanating from his body. Their humming assured her that he was with her and receiving happiness through her. Now he has departed, though he was the life of her life.

Life keeps a body fragrant, but when life departs the body soon decays and smells. Rādhā imagines that the life of her body has gone away, leaving only a moving frame. She prays to Nārāyaṇa to keep her so far from Śyāmasundara that not even air carrying the odor of her lifeless body can touch and distress him.

Then comes a new conception. Śyāmasundara's departure is wonderful because it fulfils what she had desired. Considering herself wholly unqualified, devoid of virtue and beauty, she thinks his belief that loving her could be his happiness was a delusion. She had prayed that Nārāyaṇa remove it and induce him to abandon her. She repeatedly urged her beloved to leave her painful company and accept women far more worthy, virtuous, and refined. Yet each request only increased his love. She could not bear his supposed suffering, and only abandonment seemed able to end it. Now Akrūra has taken him to Mathurā, where he must have found a worthy beloved and forgotten her. His forgetfulness will give him happiness and fulfil her deepest aspiration. This is the summit of seeking the beloved's joy.

Ordinary beings become angry with God whenever he fails to conform even slightly to their wishes. Much worship is performed so that God will make circumstances favorable, fulfil desires, grant pleasure, and withhold all pain. When hardship or the slightest loss of honor comes, even self-proclaimed devotees and renunciants begin blaming him. Yet what in this body filled with waste merits pride? If the body receives no respect or comfort and its imagined name is not worshipped, we call others uncultured, loveless, and devoid of holy company.

Whenever desire is not fulfilled, we experience opposition. A preacher who is unsuccessful concludes that no one there understands satsanga, that everyone is dry and attached to pleasure. The real grievance is simply that they did not honor him and his own hunger for recognition caused the pain. The situation would be entirely different if he were speaking only to God.

Tānasena once sang rāga Malhāra before Akbar, who was overwhelmed and asked where he had learned. Tānasena replied that his own singing was like a firefly before the sun compared with his guru Haridāsa. Akbar wished to hear the master, but Haridāsa could not be summoned to court. Tānasena told the emperor to put aside kingship, wear simple clothes, and accompany him as an ordinary man. They reached the teacher's hut, where Akbar sat unseen beneath a tree.

Haridāsa was absorbed in loving samādhi upon his Lord. When he emerged, Tānasena pretended not to remember a melody and asked to hear it again. Haridāsa took an ektārā and sang. Akbar was so overwhelmed that he fainted. Upon recovering, he asked why Tānasena, though a great musician, could not sing like that. Tānasena answered, “He sings to God, while I sing to you. That is the difference.” Producing a trained voice is one thing; singing God's glory is another.

Tulasīdāsa composed a vast work yet introduced it as Raghunātha's story written for the joy of his own heart. Others may bathe in and benefit from the flowing nectar, but loving saints do not harbor an ambition that their composition should improve the world. Their relationship is with God alone. Before him they weep, sing, praise his qualities, and recount his deeds. If another bird hears and remembers the song of the bird singing within its cage, that is incidental. Desire for an audience makes lack of attention painful and leads one to condemn good people. Loving devotees do not sing to the world. “Abandoning all dharmas” has this same meaning. Arjuna stood in another field of action, so the Lord made him perform the required work as an instrument.

Original

Hindi, Sanskrit, and Awadhi

Source: Scans 126 to 129

यही मोह-नाश है। भगवान्‌ने कहा कि मोह-नाश हो गया? अर्जुन मान रहा था कि मैं यह करूँ कि नहीं करूँ? यही तो मोह था। और मोह था क्या? उसको स्मृति आ गयी कि अरे, मैं तो इनके हाथका यन्त्र हूँ। ये यन्त्री और मैं यन्त्र, ये करनेवाले हैं। करनेवाला मैं? मैं कहनेवाला-करनेवाला कौन? ‘न योत्स्ये’, मैं तो यन्त्र हूँ। “नहीं लड़ूँगा” यह कहनेवाला कौन? कभी कठपुतली कहती है क्या कि मुझे सीधा नचाओ, टेढ़ा नचाओ, मुझे सुलाओ मत, खड़ी रखो? वह तो अपने-आप सूत्रधारके सूत्रके इशारेपर नाचती है, बिना किंतु-परंतु किये। यही स्मृति अर्जुनको हो गयी कि मैं तो आया था इस कामके लिये यन्त्र बनकर और बनने लगा यन्त्री आपके समकक्ष। अर्जुनकी जो स्वीकृति है, इस स्वीकृतिमें शरणागति का मर्म है।

संक्षेपमें मोह-नाश हो गया, इस वृत्तिका नाश हो गया कि मैं कुछ कर्ता-कराता हूँ, करने-करानेवाला हूँ, करूँगा-कराऊँगा। शरणागति परतन्त्रताका साधन है। भगवान्‌के परतन्त्र हो जाना, स्वतन्त्रता रहे नहीं। भगवान्‌की परतन्त्रताको स्वीकार कर लेना ही शरणागति है। और शरणागत कभी स्वतन्त्र नहीं होता। उसकी इच्छा भी स्वतन्त्र नहीं रहती। कोई अलगाव, कुछ भी अलग लिये हुए यदि कोई है तो उसके समर्पणमें कुछ कमी है। समर्पणमें जब समर्पक अपने-आप उसमें आकर बैठ जाता है, तभी वह कह सकता है:

मन्मनस्का मत्प्राणा मदर्थे त्यक्तदैहिकाः।

भक्त कहता है कि हमने आपमें मन लगा दिया, आपको मन अर्पण कर दिया। पर भगवान् कहते हैं, मन उसका है नहीं, मेरा मन ही उसका मन बनकर बैठ गया है। जहाँ भगवान् यह कहते हैं, वही पूर्ण समर्पण है। वहाँ अपनी अलग स्वतन्त्र इच्छा, स्वतन्त्र सत्ता, स्वतन्त्र मान्यता है ही नहीं। केवल उनकी इच्छाकी सत्ता है। श्लोकमें ‘मत्प्राणाः’ पद है, ‘मद्गतप्राणाः’ नहीं है, ‘मन्मनस्का मत्प्राणाः’ हैं। ऐसी स्थितिमें वे भक्त भगवान्‌के प्राणोंसे अनुप्राणित रहते हैं। भगवान्‌के जीवनसे वे जीवित हैं। भगवान्‌के रखनेसे उनका अस्तित्व है। भगवान् क्यों रखते हैं? अपने खेलके लिये, अपना काम करनेके लिये। यही गोपी-भाव है। शरणागतिमें मोहका नाश हो गया, कर्तृत्वका अभिमान नष्ट हो गया। “मैं आपके हाथका यन्त्र हूँ, मैं कुछ करने-करानेवाला नहीं, जो आप कहना चाहें वही मैं करनेवाला हूँ, इसलिये मैं आपकी शरणमें आया हूँ”, ये बातें मुख्य रहती हैं।

मैंने मोहवश ही जो कुछ अन्यथा सोचा, कहा। तब भगवान् श्रीकृष्ण बोले, तुमने बड़ा अच्छा किया, इतनी साधना की, जिससे तुम्हारे मोहका नाश हो गया। अर्जुनने कहा, “ना-ना, त्वत्प्रसादात्। प्रभो, यह सब आपकी कृपाका ही फल है।” शरणागत कभी भी साधनका अभिमान नहीं करता। वह तो कहता है कि आपकी कृपासे यह मोह-नाश हुआ, आपके प्रसादसे मुझे स्मृति आयी। भगवान् बोले, हमारे प्रसादको समझा, यह एक काम तो तुमने किया है, हमारी कृपाको माना। अर्जुनने उत्तर दिया, “नहीं-नहीं महाराज, मैंने नहीं माना, आपने मनवा दिया।” कैसे? यहाँपर सम्बोधन है ‘अच्युत’। आप अपने स्वभावसे कभी च्युत नहीं होते, आप सुहृद हैं। हम चाहें न चाहें आप गले पड़कर भला करते हैं। हम पीना न चाहें, आप गला पकड़कर अमृत पिलाते हैं। अच्युत है आपका स्वभाव। इसलिये यहाँ शरणागतमें यह अनुभूतिका अभिमान नहीं कि आपकी कृपाको अपनी बुद्धिसे, अपनी साधनासे प्राप्त कर सका। जो कृपामय हैं, उनकी कृपा तो सर्वत्र विकीर्ण हो रही, विस्तीर्ण हो रही है। वह कृपा स्वाभाविक है। उस स्वाभाविक कृपाने ही अपनी कृपासे, ‘जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती’, अपनी अपार कृपासे, अकारण कृपासे मेरे मोहका नाश कर दिया।

उसका प्रभाव क्या हुआ? वही जो चीज होनी चाहिये: भटकना बन्द हो जाय; जहाँ पहुँचना चाहिये, वहाँ पहुँचकर स्थिर हो जाय। ‘स्थितोऽस्मि गतसन्देहः।’ जहाँतक सन्देह रहता है, वहाँतक भटकना बन्द नहीं होता। सारे सन्देह मिट गये, स्थिरता आ गयी। अब पूछा, क्या करोगे? बस, एक ही शेष रह गयी है, अब तो ‘करिष्ये वचनं तव।’

पूरी अधीनता, भगवान्‌की पूर्ण शरणागति जब होती है, तब शरणागतको भगवान् अपना अन्तरतम खोलकर दिखाते हैं। अन्तरंग-प्रदेशको खोलकर दिखा देनेका नाम ही प्रेम है। अन्तरंगताके बिना प्रेम नहीं होता और प्रेमके बिना असली ज्ञान नहीं होता। जबतक बाहरी ज्ञान है, ऊपरका ज्ञान है, तबतक अन्तरंगता नहीं है। किसीसे भी कोई प्रेम करे, उसकी भक्ति करे, उसको जाने। उतनी बात ही जान सकेंगे, जितनी बाहरसे प्रकट है। उसके मनमें क्या है, जीवनकी गुप्त-से-गुप्त बात क्या है, सर्वगुह्यतम क्या है, यह बात तबतक हम नहीं जान सकते, जबतक हम उनकी अन्तरंगतामें प्रवेश न पा लें। उसके मनमें यह विश्वास न हो जाय कि यह मेरा है, ‘इष्टोऽसि’ में जबतक स्थित न हो जाय, तबतक अन्तरंग-रहस्य नहीं खुलता। रहस्य खोलते हैं रहस्यवाले ही। हम तो रहस्यकी कल्पना मात्र करते हैं, ऊँची-से-ऊँची कल्पना कर लेते हैं। भगवान्‌के रहस्यका उद्घाटन हम नहीं कर सकते। यह तो उन्हींके द्वारा सम्भव है जो स्वयं रहस्यमय हैं, लीलामय हैं। ‘सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।’ जिसपर कृपा हो जाती है, वही जानता है, दूसरा नहीं जान सकता।

यहाँ भगवान्‌ने स्वयं जनाया। ‘हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति’, उसीकी शरणमें जाओ, ‘तमेव शरणं गच्छ।’ फिर ऐसी बात कह दी जो परायेसे कही जाती है:

ज्ञानमाख्यातं गुह्याद् गुह्यतरं मया।

मैंने तुम्हें गुह्यसे गुह्यतर जो बात थी वह कह दी, मेरे द्वारा कही गयी। अब तुम सोच लो, जो मनमें आये करो। अर्जुन रो उठा। ये शब्द नहीं हैं, पर ध्वनि है। अर्जुन व्याकुल हो गया, रो उठा। परंतु यह भी किया उसकी परिपक्वताके लिये। यदि व्याकुलता नहीं होती तो भगवान्‌के दूसरे शब्द इस प्रकारके नहीं निकलते जो अन्तरंगताको लिये हुए हैं। अर्जुन व्याकुल हो गया कि यह क्या कह दिया? ‘त्वां प्रपन्नम्’ कहकर मैंने पूछा और प्रभुने कहना शुरू किया तथा सब कहनेके बाद अब कहते हैं कि जँचे सो करो। बड़ी विकट बात हुई। पर जब रोने लगा, तब अविलम्ब भगवान्‌ने आँसू पोंछ दिये, गलेमें हाथ डाल दिया। गलबाँही डालकर बोले, भैया, अरे तू मेरा बड़ा प्यारा है, ‘इष्टोऽसि मे।’ तू मेरा बड़ा प्रिय है, भैया, तू रोता क्यों है? ‘सर्वगुह्यतमं भूयः’, अब तुमको फिरसे सारी जो गुह्यतम बात है खोलकर कहता हूँ।

भगवान्‌का अन्तरंग खुल गया, अपनी तारीफ अपने मुँहसे की। ‘परमं वचः।’ कोई भी आदमी कहता है क्या कि मैं जो कहता हूँ वही सबसे ऊँची बात है? पर भगवान्‌ने कहा, सुनो, ‘परमं वचः’, मेरे श्रेष्ठ वचनोंको जो परम वचन हैं उन्हें सुनो, तुम्हींको सुनाता हूँ। क्योंकि ‘इष्टोऽसि मे दृढमिति’, तुम मेरे प्यारे हो, सुहृद् हो। तुम्हारा प्यार किसी हालतमें कम नहीं होता, किसी हालतमें घटता नहीं। जो प्रेम घटता, रुकता है वह प्रेम नहीं, काम है। प्रेम घटता नहीं, रुकता नहीं, मिटता नहीं। वह तो अनवरत लगातार प्रतिक्षण वर्धमान रहता है, यही प्रेमका स्वरूप है। इस प्रकार अर्जुनको ढाढ़स देकर बड़े गद्गद स्वरसे निश्चयात्मक वाणीसे कहा, “मत चिन्ता करो। तेरी चिन्ता मेरी चिन्ता है, तेरे पाप मेरे पाप। बस, तू सब कुछ छोड़ दे।”

माँका स्नेह ऐसा होता है कि माँ स्वयं बच्चेकी चीजको सँभाले। वह तो सँभालता नहीं, वह तो केवल माँको जानता है। ‘सर्वधर्मान् परित्यज्य’ का अर्थ है केवल माँको जाने। वह कहे हिलो तो हिले, बैठो तो बैठे। भगवान्‌ने कहा, हम स्वयं ऐसा कर चुके हैं। जब गोपमाताएँ, बड़ी-बूढ़ी देवियाँ कहतीं, “लाला, उठाओ जूती”, तब जूती उठा लाते। भागवतमें शब्द आता है भगवान्‌के लिये ‘दारुयन्त्रवत्।’ कठपुतलीकी तरह ये श्यामसुन्दर नाचते थे जगत्‌को आह्लादमयी गोपियोंके इशारेपर। भगवान् स्वयं स्वीकार करते हैं, हम भी कठपुतली बन जाते हैं। फिर यदि अर्जुन, तुम भी कठपुतली बन जाओ तो समझो कि तुम्हारा काम बन गया।

यह कठपुतलीपन जहाँ पूरा-पूरा इस प्रकारका बन जाता है, जहाँ प्रत्येक विचार, प्रत्येक क्रिया, प्रत्येक लीला उस प्राणाराम, परमधन, परमप्रेष्ठ प्रियतमके अनुसार उसको सुखदायिनी होने लगती है, वहाँ होता है गोपीभाव। और यह गोपीभाव जहाँ पराकाष्ठाको पहुँचा वहाँ प्रकट होता है राधाभाव। राधाभावमें जहाँ समर्पणका पूर्ण क्रियात्मक अवतरण हो जाता है वह महाभाव है और महाभावके अन्तर्निहित रहता है मादन और मोहन-भाव। आवश्यकता है केवल यन्त्र बननेकी:

तुम हो यन्त्री मैं यन्त्र, काठकी पुतली मैं तुम सूत्रधार। तुम करवाओ कहलाओ मुझे नचाओ निज इच्छानुसार॥

English translation

Source: Scans 126 to 129

This is the destruction of delusion. Arjuna's delusion was the belief that he independently decided whether to act. Remembrance returned: he was an instrument in the Lord's hands, while the Lord was the operator. Who was the “I” declaring, “I will not fight”? A puppet does not instruct the puppeteer to make it dance straight or crooked, lie down or stand. It moves by the strings without objection. Arjuna remembered that he had come as an instrument but had begun to set himself beside the operator. His acceptance contains the essence of surrender.

In brief, the notion “I act, make others act, shall do and cause to be done” was destroyed. Surrender is the discipline of dependence upon God, leaving no separate freedom, not even an independent will. If anything remains held apart, surrender is incomplete. In perfect offering, the offerer himself comes to abide within the one to whom he is offered. Thus scripture speaks of devotees whose minds and very life are the Lord's. They do not merely direct their life toward him; they live by his own life. They exist because he sustains them for his play and work. This is gopī-bhāva: delusion and pride of agency are gone, and one says, “I am the instrument in your hand. I do nothing independently. I shall do whatever you tell me, and therefore I have taken refuge in you.”

When Kṛṣṇa appears to praise Arjuna for a practice that destroyed delusion, Arjuna replies, “No, Lord, it was through your grace.” One surrendered never takes pride in practice but attributes the destruction of delusion and recovery of memory to divine grace. Even recognizing grace is not Arjuna's achievement; the Lord made him recognize it. He addresses Kṛṣṇa as Acyuta, one who never falls from his nature of benevolence. Whether we desire it or not, he embraces us for our good and forces nectar upon us when we refuse to drink. His causeless, boundless grace, spread everywhere by its own nature, destroys delusion.

Its effect is that wandering ends. One reaches the proper place and becomes steady: “I stand firm, my doubts gone.” As long as doubt remains, wandering continues. When every doubt vanishes, only one response remains: “I shall do your word.”

With complete dependence and surrender, God opens his innermost being to the surrendered soul. Love means revealing the interior realm. Without intimacy there is no love, and without love no true knowledge. External knowledge sees only what is outwardly manifest. The most hidden secret of another's heart cannot be known until one is admitted into intimacy and trusted as “my own” and “dear to me.” Only the possessor of a mystery can reveal it. We may imagine as loftily as possible but cannot disclose God's secret. Only the mysterious Lord of līlā can reveal it, and only the recipient of his grace knows.

After directing Arjuna to the indwelling Lord and to refuge in him, Kṛṣṇa says what one might say to someone distant: “I have declared knowledge more secret than the secret. Reflect fully, then act as you wish.” The text does not explicitly say Arjuna wept, but its emotional resonance suggests his anguish. He had declared himself surrendered, listened to everything, and now heard “do as you wish.” This anguish ripened him. The Lord at once wipes away his tears, embraces him, and says, “Brother, you are exceedingly dear to me. Why do you weep? Once more I shall open the most secret teaching.”

God reveals his intimate heart and calls his own words supreme. He does so because Arjuna is firmly dear to him. True love does not lessen, pause, or disappear; what does so is desire. Love grows continually at every moment. Reassuring Arjuna in a voice choked with feeling, the Lord says, “Do not worry. Your concern is my concern, your sins my sins. Leave everything.”

A mother's affection makes her care for everything belonging to the child, while the child knows only the mother. “Abandoning all dharmas” means knowing only her, moving when she says move and sitting when she says sit. Kṛṣṇa himself behaved so before the elder women of Vraja. When they told him to pick up a shoe, he did it. The Bhāgavata describes him as “like a wooden puppet,” dancing at the gopīs' gestures. The Lord accepts becoming their puppet. If Arjuna likewise becomes a puppet, his work is fulfilled.

When this instrumentality becomes complete, every thought, act, and līlā seeks only the happiness of the beloved who is one's life, treasure, and highest love. That is gopī-bhāva. At its summit appears Rādhā-bhāva. Its complete practical embodiment of surrender is mahābhāva, within which dwell mādana and mohana. The sole necessity is to become the instrument:

You are the operator, I the instrument; I am a wooden puppet and you the holder of its strings. Make me act and speak; make me dance according to your own desire.

Original

Hindi

Source: Caption on scan 130

भगवान् श्रीकृष्णके चरण

English translation

Source: Caption on scan 130

The Feet of Bhagavān Śrī Kṛṣṇa