Original
Sanskrit invocation
॥ विजयेतां श्रीप्रियाप्रियतमौ ॥
English translation
May Śrī Priyā and Her most beloved Lord be ever victorious.
Original
निश्चानुरञ्जन लीला
श्रीयमुना-पृष्ठपर प्रिया-प्रियतम घूम रहे हैं। सखियोंकी टोली आगे-पीछे तथा दाहिने-बायें घेरे चल रही है। श्यामसुन्दरने बायें हाथसे प्रियाजीकी कमरके दाहिने ओरके अञ्चलका एक कोर पकड़ रखा है तथा प्रिया उनके बायें कंधेको दाहिने हाथसे पकड़े, बायें हाथमें कमलका पुष्प डंडीके सहारे घुमाती जा रही हैं। श्यामसुन्दरके दाहिने हाथमें लेनेको बनी हुई सुनहरी झोली है। ध्यानसे सने दोनों एक-दूसरेकी ओर बीच-बीचमें झुकते, वनकी शोभा निहारते, पुष्प चुनते हुए मुख्यतः पूर्वकी ओर बढ़ रहे हैं।
चन्द्रदेवकी शुभ्र चाँदनीसे वन जगमगा रहा है। प्रियाजी एवं सखियाँ अस्तई रंगकी रेशमी साड़ियाँ पहने हैं। श्यामसुन्दर धोती तथा कंधेपर गाढ़े पीले रंगकी जरीदार चादर पहने हैं। उनके अङ्गसे नीलिमा-मिश्रित एवं श्रीप्रियाके अङ्गसे पीत-पुटित शुभ्र ज्योति निकल रही है। शीतल, मन्द, सुगन्धित पवन चल रहा है। चम्पा, स्थल-कमल एवं विभिन्न पुष्पोंके वृक्ष हिलकर प्रिया-प्रियतमको बुला रहे हैं, “आओ, मेरे जीवन-सर्वस्व! तुम्हारे लिये ही पुष्पोंकी डाली सजा रखी है। अपने प्यारभरे हाथोंसे उपहार ग्रहण करो।”
दोनों प्रत्येक पुष्प-वृक्षसे पाँच-सात पुष्प चुनकर, सूँघकर गुणमञ्जरीकी डलियामें रखते हैं। कभी श्यामसुन्दर प्रियाजीको और कभी वे श्यामसुन्दरको खींचती हैं। वे शाखा झुकाकर उनके मुखके पास ले जाती हैं; वे ठोढ़ी छूकर एक-दो पुष्प उनके सिरपर रखते हैं। वे वही पुष्प उनके कंधेपर रख मुसकराती हैं। इस प्रकार वृक्ष-लताओंको छूकर उनका आनन्द बढ़ाते पूर्व जाते हैं।
English translation
The Līlā of Guileless Affection
Priyā and Her beloved wander beside the Yamunā surrounded by sakhīs. Śyāmasundara holds one corner of Her veil at the waist; She holds His left shoulder and twirls a lotus. Bathed in moonlight, They move east gathering flowers. Their blue and golden-white radiance mingles with fragrant breezes.
The flowering trees seem to beg Them to accept their offerings. From each They gather, smell, and place several blossoms in Guṇamañjarī's basket. They playfully pull one another forward, touch the vines, and exchange flowers with smiles.
Original
मयूरोंकी टोली पंख फैलाकर नृत्य कर रही है। उनके पास पहुँचते ही वे “को-ओं” बोलते हुए प्रिया-प्रियतमकी प्रदक्षिणा करते हैं। श्यामसुन्दर कहते हैं, “मयूरों! मेरी तरह रास-नृत्य करके दिखाओ।” एक मयूरी-मयूरका जोड़ा मध्यमें और दल मण्डलाकार खड़ा होता है। मयूरी प्रियाजी तथा मयूर श्यामसुन्दरको सिर नवाते हैं। मयूर संकेत करता है। श्यामसुन्दर हँसते हैं, “हाँ-हाँ, मैं मुरली बजाता हूँ, तुम नृत्य आरम्भ करो।”
मुरलीकी तानपर दल मध्यके जोड़ेके चारों ओर घूमता है; मध्यका जोड़ा चोंच मिलाकर थिरकता है। श्रीप्रिया खिलखिलातीं, गुणमञ्जरीकी डलियासे दोनों अञ्जलियोंमें पुष्प भरकर इस प्रकार बिखेरती हैं कि प्रत्येक पक्षीपर पुष्प गिरे। मयूर कलरव करते हैं और सारा वन हँसीसे गूँजता है। श्रीप्रिया श्यामसुन्दरकी पीली चादर झटकती हुई चरणोंके पास बैठकर लोट-पोट होती हैं। वे भी बैठ जाते हैं, पर मुरली बजाते रहते हैं। रानी उनका कंधा पकड़कर मुरली होठोंसे हटा देती हैं। मुरली रुकते ही नृत्य रुक जाता है।
हँसी शान्त होनेपर श्यामसुन्दर कहते हैं, “प्रिये! मयूरोंको नृत्यका पुरस्कार दो।” गुणमञ्जरी और वृन्दाकी दासियाँ सोनेकी परातोंमें पीली, सोने-चाँदीके वरकवाली मिठाइयाँ लाती हैं। रानी मिठाई श्यामसुन्दरके हाथमें देती हैं। सखियाँ देखती हैं कि वे प्रत्येक मयूरके पास एक साथ खड़े होकर प्रेमसे खिलाते, सिर सहलाते, सोनेके कटोरेसे जल पिलाते और पीताम्बरसे चोंच पोंछते हैं।
English translation
Peacocks circle the pair. At Śyāmasundara's request they form a rāsa circle around one dancing couple while He plays the flute. Rādhā showers them with flowers and collapses laughing at His feet, finally pulling the flute from His lips.
As their reward, Guṇamañjarī brings gold trays of yellow sweets covered in foil. Śyāmasundara appears beside every bird at once, feeding and caressing each, giving water, and wiping their beaks with His yellow cloth.
Original
पुनः पूर्व बढ़ते समय ऊँचे वृक्ष डालियाँ हिलाकर पुष्प-वर्षा करते हैं। श्रीप्रिया अञ्चल तथा श्यामसुन्दर पीताम्बर फैलाते हैं और पुष्प दो मञ्जरियोंकी डलियोंमें उड़ेलते हैं। वे अत्यन्त विशाल गोलाकार संगमरमरकी वेदीपर पहुँचते हैं, जिसका व्यास करीब सौ गज और ऊँचाई एक हाथ है। चारों ओर केलेके वृक्षोंके पत्तोंसे मेहराब बने हैं। कमल-पुष्पोंसे पिरोये बेंच-जैसे आसन तथा नीली जरीदार कालीन सजी है। दक्षिण भागमें पुष्पोंका सिंहासन है। पश्चिम, पूर्व और दक्षिणमें लताओंके निकुञ्ज और उत्तरमें चालीस गज दूर यमुना है।
वृन्दादेवी सिंहासन पोंछकर प्रिया-प्रियतमको बैठाती हैं। दासियाँ पश्चिमी निकुञ्जसे अनेक वाद्य ले आती हैं। वृन्दा पान देना चाहती हैं; कृष्ण पहले प्रियाजीको देनेका आग्रह करते हैं। वे स्वीकार नहीं करतीं तो कृष्ण बीड़ा लेकर उनके होठोंसे लगाते हैं। वे दाँतोंसे पकड़ती हैं, पर वे झटककर स्वयं खा लेते हैं, “अच्छा, मैं ही पहले खाता हूँ, तुम्हारी जीत सही।” रानी हाथ बढ़ाती रह जातीं और तिरछी चितवनसे कहती हैं, “धूर्त!”
श्यामसुन्दर कहते हैं, “अब ऐसा नहीं करूँगा।” दूसरा बीड़ा देते समय प्रियाजी उनका हाथ पकड़कर सावधानीसे लेती हैं। फिर वे स्वयं प्रत्येक सखीको एक ही समय पान खिलाते हैं। प्रत्येक कहती है कि अभी वाद्यका सुर ठीक कर रही हूँ। वे उत्तर देते हैं, “हाथसे थोड़े ही खाओगी। सुर ठीक करती रहो, मैं मुँहमें रख देता हूँ।” सखी पूछती है, “धूर्तता तो नहीं करोगे?” वे कहते हैं, “सर्वथा नहीं,” पान खिलाकर कपोल छूते हैं, “चूना अधिक हो तो उगल देना।”
English translation
Trees rain blossoms as They reach an immense marble platform adorned with banana arches, lotus seats, a blue brocade carpet, and a flower throne. Vṛndā seats Them and brings instruments and betel.
Kṛṣṇa teasingly touches a leaf to Rādhā's lips, snatches it back, and eats it Himself. Calling Him a rogue, She carefully accepts the next. He then manifests beside every sakhī at once and feeds each while she tunes her instrument, promising no trickery.
Original
राधारानीने पान खिलाते समय रखी गयी मुरली उठाकर हृदयसे लगा ली थी और समाधिस्थ-सी बैठी थीं। श्यामसुन्दर लौटकर उनकी मुख-शोभा निहारते हैं। ललिता हँसती हैं तो वे रानीकी ठोढ़ी छूकर कहते हैं, “प्रिये! आज मुरलीका सौभाग्य है कि तूने हृदयसे लगाकर इसकी व्यथा दूर की। यह कहती थी कि जब मैं इसमें ‘राधा-राधा’की तान छेड़ता हूँ, राधारानी मुझे न पाकर रोती हैं और मुरलीसे पूछती हैं: ‘तू स्त्री होकर वियोगकी आग जानती है, फिर मुझे क्यों छलती है? हर दिशामें तू बजती प्रतीत होती है और मैं निर्णय नहीं कर पाती कि प्रियतम कहाँ हैं।’
“मुरली कहती है: ‘मैं छलती नहीं, तुम्हारा हृदय छलता है। उसीमें श्यामसुन्दर निरन्तर बसे हैं और उनका संग करते-करते वह उन्हींकी तरह तुम्हें ठगने लगा है। अभी जाँच लो। मैं हृदयसे लगी हूँ, श्यामसुन्दर बगलमें हैं, पर हृदय सुझा रहा है कि दूर कदम्बकी छायामें वे मुरलीमें तुम्हारा नाम गाकर बुला रहे हैं।’ मैंने मुरलीसे वचन दिया था कि उसे तुम्हारे हृदयतक पहुँचाऊँगा। अब उससे पूछकर संदेह मिटा लेना।”
चेत होनेपर रानी परिस्थिति समझकर संकुचित होती हैं। बात बदलनेके लिये मुरली श्यामसुन्दरके होठोंपर रखती हैं, “आज विशाखाने सुन्दर गीत सुनाया था। विशाखाकी वीणाके सुरमें मुरली बजा दो; जान-बूझकर सुर न बिगाड़ना।”
श्यामसुन्दर कहते हैं, “विशाखे! गा, पर मुरली बजानेका ठीक पारिश्रमिक तुम्हारी सखीसे मिलना चाहिये।” विशाखा कहती हैं कि अनाप-शनाप माँगके लिये वह उत्तरदायी नहीं। ललिता कहती हैं, “सज्जन कलाकार मोल-तोल नहीं करते; पहले मेरी सखीको प्रसन्न करो।” वे कहते हैं, “बस ललिते, यह वचन याद रखना।”
English translation
While He fed the sakhīs, Rādhā pressed His flute to Her heart and lost outer awareness. He explains that the flute grieves because its “Rādhā” melody makes Her search every direction and weep. The flute wishes to reveal that it is Her own heart, eternally holding Śyāmasundara, that conjures His distant call.
Embarrassed upon awakening, Rādhā asks Him to accompany Viśākhā's song. He agrees only after Lalitā promises suitable compensation.
Original
Braj Bhāṣā song
सखि हौं श्याम रंग रेंगी।
देखि बिकाइ गई वा मूरति, सूरति माँहि पगी॥
संग हुती अपनों सपनों सो, सोइ रही रस खोई।
जागेहु आगे दृष्टि परे सखि, नेकू न न्यारो होई॥
एक जु मेरी अँखियनिमें निस-बासर रह्यो करि भौन।
गाइ चरावन जात सुन्यो सखि, सो यह कन्हैया कौन॥
कासों कहीं कौन पतियावे, कौन करे बकवाद।
कैसे के कहि जात गदाधर, गूँगे कौ गुड़ स्वाद॥
English translation
Friend, I am dyed in Śyāma's color.
Seeing that form, I sold myself and became steeped in His remembrance.
I was with Him as in a dream, asleep and lost in rasa.
Awake, I see Him before me, never separate even slightly.
The One who dwells day and night within my eyes,
who then is this Kanhaiyā said to go grazing cows?
Whom could I tell, and who would believe without dispute?
Gadādhara says it cannot be told, like the taste of sugar to one without speech.
Original
गीत समाप्त होते ही मण्डली प्रेममें बेसुध हो जाती है। श्यामसुन्दर तिरछी चितवनसे श्रीप्रियाको देखकर मुसकराते हैं। वे कुछ क्षण हक्की-बक्की बैठीं, फिर उनका कंधा हिलाकर हँस पड़ती हैं। श्यामसुन्दर विशाखासे कहते हैं कि सखीसे पूछो मुरली ठीक बजी और सुख मिला या नहीं; सुख मिला तो पारिश्रमिक पुरस्कारके साथ मिले।
ललिता कहती हैं, “न्याय यह है कि पुरस्कार मुरलीको और पारिश्रमिक तुम्हें मिले। मुरली हमारी जातिकी है और तुम्हारे सामने हमसे पुरस्कार लेनेमें संकोच होगा, इसलिये हमें दे दो। मैं पुरस्कार देकर लौटा दूँगी। पारिश्रमिककी बात विशाखासे करो।”
श्यामसुन्दर हँसते हैं, “अच्छी पंच बनी! यह मुरली मुझसे इतना प्रेम करती है कि संकेतसे ही अपने होठ मेरे होठोंपर रखकर मेरे कहे अनुसार चलती है। तुम्हारी सखीको मनानेमें बहुत अनुनय करना पड़ता है। इसे संकोच नहीं होगा।”
ललिता कहती हैं, “जितनी देर तुमने इसे होठोंपर रखकर विशाखाके संगीतमें सुर भरा, उतनी देर मेरी सखी राधा इसे अपने होठोंपर रखकर तुम्हारे गानेके समय सुर भरेंगी।” श्यामसुन्दर प्रसन्न होकर कहते हैं, “बहुत उदार पुरस्कार! अब पारिश्रमिक पाकर निहाल हो जाऊँगा; पारिश्रमिक पुरस्कारसे बहुत अधिक होता है।”
English translation
After the song, Lalitā rules that the flute's reward will be for Rādhā to hold it to Her lips and accompany Śyāmasundara for as long as He accompanied Viśākhā. He delights in this generous award and anticipates an even greater fee.
Original
Braj Bhāṣā song
श्यामसुन्दर फुर्तीसे श्रीप्रियाके होठोंपर वंशी रखते हैं। वे फूँक भरतीं और बायें हाथसे पकड़ती हैं; दाहिना हाथ उनके कंधेपर रहता है। श्यामसुन्दर तिरछे बैठकर अन्य छिद्रोंको दबाते-उठाते सुर ठीक करते हैं। वाद्य बजते हैं और वे गाते हैं:
प्यारी तेरे नैननि को ब्यौहार।
रूप तुरंग चढ़े मदमाते, मृग मन करत सिकार॥
भौंह कमान रही चढ़ि दिन प्रति, चितवनि बान सुचार।
सहज अरुन क्षति ऊपर हमारे, सूनी खून खुमार॥
कज्जल रेख जनी अति तीखी, निरखि हरत सत मार।
अलबेली अति प्रान विहंगम, परे प्रेम के जार॥
English translation
Śyāmasundara places the flute at Priyā's lips. She blows while He fingers the holes and sings:
Beloved, behold the dealings of Your eyes.
Mounted intoxicated upon the steed of beauty, they hunt the deer of my mind.
Your bowlike brows remain drawn, Your glances perfect arrows.
Their natural redness wounds me, drunk on the blood they draw.
The sharp line of collyrium kills at a glance.
My wayward bird of life is caught in love's net.
Original
वन रसमय हो उठता है; वृक्षोंसे रस चूने लगता है। संगीत बंद होनेपर भी अन्तिम चरण दिशाओंमें गूँजता है। श्रीप्रिया धीरेसे खड़ी होकर चित्राको कानमें कुछ कहती हैं। चित्रा कहती हैं, “अब मेरी सखी गाना चाहती है, पर वचन दो कि संगीत समाप्त होनेतक स्थिर बैठकर सुनोगे।” श्यामसुन्दर वचन देते हैं। श्रीप्रिया विशाखाके हाथसे वीणा लेकर गाती हैं:
जब रूप के रंग रेंगी सजनी, तब चौंकि पलटि सुदावहि को।
झुकि कञ्ज गनोज ते भाति-सी, लपकी चकरीन उठावहि को॥
कब मादक माधुरी पान पी, पकि प्रेमके ओट दुरावहि को।
सुनि गदाधर गुप्तकी आँखनिसों, डरिहैं कछु सुरति बतावहि को॥
श्यामसुन्दर मन्द मुसकराते एकटक देखते हैं। श्रीप्रिया बीच-बीचमें दृष्टि उठातीं, उन्हें देखते पाकर लजाकर आँखें नीची करती हैं। सखियाँ कहती हैं, “बंद मत करना, एक और!”
English translation
Though the music stops, its final line echoes through the forest. Rādhā takes the vīṇā after Śyāmasundara promises to remain seated and sings of a friend dyed in beauty's hue, startled into turning, drinking intoxicating sweetness, hiding behind love, and fearing that secret eyes may reveal remembrance.
Original
second Braj Bhāṣā song
अक्ष कोर अकोर बनाय भट, ससि अञ्जन रो सरमावहि को।
सर बोलन गाढ़ कयों न पसे, हँसि दै कर जोरि मनावहि को॥
सुर कान ते मोहि पुरी री, द्युति ब्यूरो रन बीथि महा को।
सुनि गदाधर गुप्तकी आँखनिसों, डरिहैं कछु सुरति बतावहि को॥
अन्तिम चरण गाते-गाते श्रीप्रियाका कण्ठ भरता, शरीर पसीनेसे भरता और आँखें बंद होती हैं। वे मूर्छित होकर गिरतीं, पर श्यामसुन्दर सँभालकर अपनी गोदमें सिर रख देते और ललाट सहलाते हैं। सखियाँ भी आत्मज्ञान-शून्य-सी हो गयी हैं।
English translation
At the sakhīs' request She sings again of wide eyes shaming moon and collyrium, thick speech, folded hands, and the secret gaze that may betray remembrance. Her voice chokes, perspiration covers Her, and She faints. Śyāmasundara catches Her, rests Her head in His lap, and strokes Her brow as the sakhīs lose outer awareness.
Original
कुछ देर बाद श्रीप्रिया आँखें खोलकर श्यामसुन्दरकी गोदसे उठतीं, मुसकराकर उनका कान और ठोढ़ी हिलाती हैं, “तुमने वचन भंग किया! संगीतके बीच उठे क्यों?”
वे कहते हैं, “जबतक संगीत था, स्थिर सुनता रहा। तुमने संगीत बिगाड़ा, तेरी वाणी लड़खड़ाने लगी, तो वशमें क्यों रहता?” सब हँसते हैं। दासियाँ पीले पान-पत्तोंके बीड़े सोनेकी परातमें लाती हैं। श्रीप्रिया अपने हाथसे दो बीड़े उन्हें देती हैं। वे उन्हें खिलाना चाहते हैं, पर वे कहती हैं, “मुझे प्यास लगी है।” वे कहते हैं, “मुझे भी थी, पर तुमने पहले पान खिला दिया; तुम्हारे हाथका पान कैसे छोड़ता?”
रूपमञ्जरी सोनेके लम्बे गिलासमें शीतल सुवासित जल देती है। श्यामसुन्दर पान पीकदानमें डालकर कुल्ला करते और आधा जल पीते हैं, फिर गिलास राधारानीके होठोंसे लगाते हैं। वे लजाते पाँच-छः घूँट पीती हैं। चित्रा दोनोंके मुख सुन्दर रूमालसे पोंछती हैं। रानी उन्हें एक बीड़ा और देती हैं; वे जानबूझकर दो बड़े बीड़े एक साथ रानीके मुखमें रखते हैं। दाहिना कपोल उभरता है। वे देखकर मुसकराते हैं, और रानी लजाकर पान पतला कर लेती हैं। फिर श्यामसुन्दर सब सखियोंको एक क्षणमें पान खिला देते हैं।
English translation
Reviving, Rādhā accuses Him of breaking His promise. He replies that Her faltering voice had already broken the music. Amid laughter They share betel and scented water. He teasingly puts two large leaves into Her mouth at once, making Her cheek bulge, then feeds every sakhī simultaneously.
Original
राधारानी उठती हैं। वृन्दाकी दासी यमुनाके प्रवाहसे कमल तोड़कर देती है। वे कहती हैं, “री! एक और तोड़ ला।” श्यामसुन्दर बोलते हैं, “प्रिये! चलो, आज नावपर चढ़कर कमलके फूल तोड़ें।” कई सखियाँ एक साथ कहती हैं, “हाँ, हाँ, चलो।”
विशाखा उत्तरकी ओर चलती हैं। श्यामसुन्दर कहते हैं, “विशाखा रानी! मेरा पारिश्रमिक शेष है। यमुनाके कमल-वनसे पार होनेतक मिल जाना चाहिये। दायित्व तुमपर है।” विशाखा राधाके कानमें कुछ कहती हैं। रानी मुसकराकर कहती हैं, “बहुत ठीक।” विशाखा कहती हैं, “मिल जायेगा, मेरी सखीकी आज्ञा हो गयी है।”
प्रिया-प्रियतम मन्द-मधुर गतिसे उत्तरकी ओर चलते हुए कमल-वन-विहारके लिये यमुना-तटपर खड़े हो जाते हैं।
English translation
When a maid brings a lotus from the Yamunā, Śyāmasundara proposes gathering more by boat. As all set out northward, He reminds Viśākhā that His fee must be paid before they cross the lotus forest. Viśākhā whispers to Rādhā, receives Her smiling consent, and promises it. The divine pair reach the riverbank for Their lotus-grove excursion.