Original
Sanskrit invocation
॥ विजयेतां श्रीप्रियाप्रियतमौ ॥
English translation
May Śrī Priyā and Her most beloved Lord be ever victorious.
Original
प्रेमाप्लावन लीला
श्रीयमुनासे निकले हुए स्रोतके उद्गमपर नीले रंगका पुल शोभा पा रहा है। उसी पुलके घेरेपर दक्षिणकी ओर मुख करके झुकी हुई श्रीप्रिया खड़ी हैं। प्यारे श्यामसुन्दरके आनेकी प्रतीक्षामें वे उसी पुलपर बैठी थीं, पर हृदयका प्यार उद्वेलित होनेसे बैठी नहीं रह सकीं। घेरेपर शरीरका भार देकर खड़ी हो गयीं तथा उसी पगडंडीकी ओर देखने लगीं जिससे श्यामसुन्दरके आनेकी सम्भावना है।
रात्रि प्रहरभर व्यतीत हो चुकी है। आज कृष्णपक्षकी प्रतिपदा है, फिर भी चन्द्रदेव काफी ऊपर उठ चुके हैं। चन्द्रबिम्ब स्रोतके जलमें प्रतिबिम्बित तथा धाराके वेगसे हिल रहा है। रानीको उसमें भी प्यारे श्यामसुन्दर दीख रहे हैं। वही चिर-परिचित हँसता हुआ मुखारविन्द स्रोतके निर्मल जलमें नाच रहा है।
पासमें बाँयी ओर विशाखा खड़ी हैं। रानी उनका दाहिना हाथ पकड़कर एक-एक अँगुलीका स्पर्श करतीं और हँसकर पूछती हैं, “विशाखे! तू जानती है, श्यामसुन्दरको नाचना किसने सिखाया?”
विशाखा उत्तर देती हैं, “तुम्हारी आँखोंने।”
रानी हाथ झकझोरती हैं, “मैं सच्ची बात पूछ रही हूँ और तू विनोद कर रही है।”
विशाखा रानीका कंधा पकड़कर मुसकराती हैं, “विनोद नहीं, मैंने बिलकुल सच्ची बात कही है।”
English translation
The Flood of Love Līlā
A blue bridge adorns the source flowing from the Yamunā. Leaning southward over its rail, Priyā watches the path by which Śyāmasundara may come. She had been sitting, but the surge of love forced Her to rise.
One watch of the night has passed. Though it is the first night of the dark fortnight, the moon is high and its reflection trembles in the current. Rādhā sees only Śyāmasundara's familiar smiling face dancing in the clear water.
She takes Viśākhā's hand and asks who taught Him to dance. “Your eyes,” Viśākhā replies. Rādhā protests that she is joking, but Viśākhā insists it is entirely true.
Original
रानी कुछ देरतक आकाशके चन्द्र और जलके प्रतिबिम्बको देखती हैं; दोनों जगह श्यामसुन्दरका मुख दीखता है। वे पूछती हैं, “किसने नाचना सिखाया, मैं बताऊँ?” विशाखा कहती हैं, “बता।” रानी जलकी ओर संकेत करती हैं। इस बार उन्हें स्रोतका जल एवं चन्द्रबिम्ब सर्वथा नहीं दीखता। स्पष्ट प्रतीत होता है कि धाराके ऊपर अपने अङ्गोंको हिलाते हुए श्यामसुन्दर खड़े हैं। रानी झटपट बोल उठती हैं, “अरे! वे तो आ गये!”
विशाखा खिलखिलाकर हँसती हैं। रानी लजा जाती हैं और समझती हैं कि भ्रम होनेके कारण वह हँस रही है। यमुनाकी धारा झर-झर स्रोतसे बह रही है। रानी फेनिल धाराकी ओर देखती हैं; दृष्टि फेनपर है, पर मन भावोंकी तरंगोंमें डूबकर किसी सुदूर नीरव निकुञ्जमें प्रियतमके साथ विनोद अनुभव कर रहा है। विशाखा उनकी ठोढ़ी हिलाकर कहती हैं, “क्यों, बोलती नहीं? चुप क्यों हो गयी?”
रानी भाव-राज्यसे उतरकर भाव छिपानेके लिये हँसती हैं, फिर कहती हैं, “चल, पुलके नीचे चलें।” विशाखाका हाथ पकड़े पश्चिम जातीं, दक्षिण मुड़कर सीढ़ियोंसे स्रोतके पास पहुँचतीं और जलको छूती सीढ़ीके ऊपर बैठ जाती हैं। विशाखा दाहिनी ओर हाथ पकड़े झुकी खड़ी रहती हैं।
English translation
Rādhā sees His face in both moons and points to the water. The water and reflection vanish from Her sight, replaced by Śyāmasundara dancing upon the current. “He has come!” She cries. Viśākhā laughs, and Rādhā blushes at Her delusion.
As the stream murmurs, Her gaze rests on its foam while Her mind plays with Her beloved in a distant silent bower. Viśākhā recalls Her, and Rādhā conceals Her mood with laughter. Taking Viśākhā's hand, She descends beneath the bridge and sits just above the water.
Original
चन्द्रमाकी शुभ्र किरणें जल, फेन, सीढ़ियों एवं रानीके मुखारविन्दपर पड़ रही हैं। पुलके नीचेसे आनेके कारण धारा मँडराकर कभी-कभी मेघाकार धारण करती है। फेनके बुलबुले नाचते हुए सीढ़ियोंसे टकराकर विलीन हो जाते हैं। रानी हाथपर बुलबुलोंको उठा लेती हैं; आते ही वे विलीन हो जाते हैं। बात यह है कि उन बुलबुलोंमें भी रानीको प्यारे श्यामसुन्दरकी छवि दीखती है। उनका प्यारभरा हृदय भोली बालिकाके हृदय जैसा बन जाता है, इसलिये बार-बार हाथ बढ़ाती हैं।
विशाखा हँसती हैं, “क्या कर रही है?” रानी उन्हें झटका देकर पास बैठाती और आशासे कहती हैं, “अच्छा, तू उठा तो सही। सम्भवतः तेरे हाथपर बुलबुले आ जायें।” विशाखा पूछती हैं, “मैं जो कहूँगी, सो क्या देगी?” रानी झट कहती हैं, “तू जो कहेगी, वही दूँगी।”
विशाखा दोनों हाथोंकी अञ्जलिमें फेनका जल उठाती हैं। कुछ क्षण बुलबुले बने रहते हैं। रानी उनमें श्यामसुन्दरको स्पष्ट देखकर आनन्दमें निमग्न हो जाती हैं। विशाखा तुरंत जल गिराकर कहती हैं, “देख, मैंने बुलबुले उठा लिये न!” रानी प्रेममें भरकर उन्हें हृदयसे लगा लेती हैं। फिर उनके आँचलसे दाहिना हाथ पोंछती हुई दो सीढ़ी ऊपर चढ़कर बैठ जाती हैं। विशाखा पास बैठती हैं। कुछ मञ्जरियाँ एवं तुङ्गविद्या, इन्दुलेखा, चम्पकलता उतरकर रानीको घेरकर बैठ जाती हैं।
English translation
Moonlight falls on water, foam, steps, and Rādhā's face. Bubbles dance against the steps and vanish. Seeing Śyāmasundara in them, She reaches again and again like an innocent child.
At Her request Viśākhā cups foamy water in both palms. For a moment the bubbles remain and Rādhā beholds Him clearly. Viśākhā spills them with a laugh, and Rādhā embraces her. They move two steps higher as Tuṅgavidyā, Indulekhā, Campakalatā, and the mañjarīs gather around.
Original
चित्राको देखकर रानी कहती हैं, “अच्छा, तू आ गयी। अब एक कथा सुना।” चित्रा कहती हैं, “सायंकाल हम लोगोंके पीछेसे तू जो सुन रही थी, उसे ही पूरा होने दे।” रानी उल्लासमें कहती हैं, “हाँ, हाँ, उसे सुना! तूने ठीक याद दिलाया।”
चित्रा एक मञ्जरीको पुकारती हैं, जो ऊपर पुष्पमाला बना रही थी। वह डलिया हाथमें लिये पूछती है, “क्यों चित्रारानी! मुझे पुकारा है?” उसकी बोली सुनकर राधारानी प्यारसे कहती हैं, “हाँ री, इधर आ।” मञ्जरी सामने आती है। रानी हाथ पकड़कर नीचेकी सीढ़ीपर बैठाती, दोनों हाथ उसके गलेमें डालती, मुख देखती और होठ चूम लेती हैं। मञ्जरीकी आँखोंसे प्रेमके आँसू बहते हैं। रानी आँचलसे पोंछती हैं। कुछ क्षण भावभरी नीरवता होती है। रानी उत्कण्ठासे कहती हैं, “हाँ, अब आगे सुना!”
मञ्जरी बायाँ हाथ श्रीप्रियाकी दाहिनी जंघापर रखकर कहती है, “रानी! फिर मैं साहस करके उद्यानमें प्रवेश कर गयी। दक्षिण बढ़नेपर मल्लिका पुष्पोंकी सुन्दर क्यारियाँ देखीं। टहनियाँ पुष्पोंसे लदी थीं। बायें हाथसे आँचलकी झोली बनाकर दाहिनेसे पुष्प तोड़ने लगी। मेरा मन अनिर्वचनीय प्रसन्नतासे उत्तरोत्तर मस्त हो रहा था। हृदयमें गुदगुदी थी। भावोंको सँभालनेमें असमर्थ होकर मधुर कण्ठसे गाने लगी:
English translation
Rādhā asks Citrā for a story. Citrā calls the mañjarī whose account had been interrupted at dusk. Rādhā seats her close, embraces and kisses her, wipes away her tears, and eagerly asks her to continue.
The mañjarī says she boldly entered the garden and found jasmine beds laden with blossoms. Gathering them into her veil, her heart grew inexplicably joyful and she began to sing:
Original
song attributed to Mīrā
चालाँ वाही देस, प्रीतम पावाँ, चालाँ वाही देस।
कहो कुसुमल साड़ी रंगावाँ, कहो तो भगवाँ भेस॥
कहो तो मोतियन माँग भरावाँ, कहो छिटकावाँ केस। —मीरा
English translation
I shall go to that land and find my beloved. I shall go to that land.
Tell me, shall I dye my sari safflower-red, or shall I wear the ochre garb?
Tell me, shall I fill my parting with pearls, or let my hair fall loose? Mīrā.
Original
मञ्जरी कहती है, “मैं अन्तिम चरण बार-बार गाती और पुष्प तोड़ती रही। तभी पश्चिम-दक्षिणकी ओर दस-बारह हाथ दूर एक वन्य वृक्षके नीचे प्यारे श्यामसुन्दर खड़े प्यारभरी दृष्टिसे मुझे देखते दीखे। अकेलेमें उनके दर्शनका यह प्रथम अवसर था, अतः मैं लज्जित हो गयी।
“वे बोले, ‘री! तू तो बहुत सुन्दर गाती है।’ मैं और लज्जित हुई। उन्होंने पूछा, ‘इस समय यहाँ पुष्प क्यों तोड़ रही है?’ मैंने धीरेसे कहा, ‘रानीने ही पर्याप्त पुष्प लानेको कहा है।’ रानी, तुम्हारा नाम सुनते ही उनकी आँखोंमें आँसू भर आये। पीताम्बरसे मुख पोंछनेके बहाने आँसू छिपाकर बोले, ‘इधर आ, एक बात सुन।’
“उनके स्वरमें ऐसी मधुरता और निर्मल प्रेम था कि सुध-बुध खोने लगी। स्मरण था कि उन्होंने बुलाया है, पर पैर भूमिसे चिपके थे। फिर पुकारा, ‘क्यों, नहीं आयेगी?’ मैं सँभल न सकी, वहीं बैठकर मूर्छित हो गयी। चेतना आयी तो वे पास मुसकरा रहे थे और मेरा आँचल पुष्पोंसे भरा था। मैंने पूछा, ‘इतने पुष्प कहाँसे आये?’
“वे हँसे, ‘बावली! आयी थी पुष्प तोड़ने और सो गयी। खाली हाथ जाती तो तेरी रानी मुझे उपालम्भ देती कि मेरे कारण तुझे खाली हाथ लौटना पड़ा। इसलिये पुष्प तोड़कर तेरे आँचलमें रख दिये। तेरा कार्य कर दिया।’ मैं फिर प्रेममें विभोर हुई। कुछ देर बाद इच्छा न होनेपर भी बोली, ‘तो मैं अब जाती हूँ।’
“वे बोले, ‘मैंने तेरा काम किया, फिर इतनी शीघ्र कृतघ्न बन गयी?’ मैं हँसकर पूछी, ‘बदलेमें क्या चाहते हो?’ उन्होंने कहा, ‘तू भी मेरा एक काम कर दे, पर कोई जानने न पावे।’ मैंने पहले काम बतानेको कहा। वे पूछते रहे कि किसीसे बतायेगी तो नहीं; मैंने कहा, ‘यह पहले कैसे कह दूँ?’ गम्भीर होकर बोले, ‘सचमुच काम लेना है, विनोद मत समझ।’ मैंने भी कहा कि विनोद नहीं समझ रही।”
English translation
She saw Śyāmasundara beneath a tree nearby, gazing lovingly at her. It was her first solitary meeting with Him. He praised her singing and asked why she gathered flowers. At Rādhā's name His eyes filled, though He hid the tears and called her near.
The purity of His voice overwhelmed her and she fainted. Awakening, she found Him smiling beside her and her veil filled with flowers. He explained that He had gathered them lest Rādhā blame Him for sending her back empty-handed. When she tried to leave, He playfully demanded a service in return, one she must keep secret.
Original
“श्यामसुन्दर अतिशय प्रेमसे बोले, ‘संध्या समय गोष्ठमें जहाँ बैठकर मैं वंशी बजाऊँगा, उसके ठीक सामने दक्षिणकी तरफ यमुना-तटपर एक घड़ी रात बीतनेपर तू आ जाना। वहाँ सुबल खड़ा मिलेगा। वह तुझे जो दे, अपनी रानीको ले जाकर दे देना। समझी?’ मैंने कहा, ‘अच्छी बात है।’
“उन्होंने कहा, ‘उसके पहले तुमसे एक वस्तु लेनी है।’ मैंने पूछा कैसी। वे बोले, ‘तू देगी तो?’ मैंने सोचकर हाँ कहा। उन्होंने पूछा, ‘तेरे पास एक अँगूठी है न?’ मैंने कहा बहुत-सी हैं। वे हँसे, ‘मैं उसकी बात कह रहा हूँ, जिसके नगमें तेरी रानीका चित्र अङ्कित है। वह मुझे दे दे।’ मैंने कहा, ‘दे दूँगी; पर क्या करोगे?’
“यह सुनते ही उनकी आँखें भर आयीं और गला रुँध गया। कुछ क्षण बाद बोले, ‘जितनी देर तेरी रानी पास रहती है, संसार ही नहीं अपने-आपतकको भूला रहता हूँ; पर उनके जाते ही मन विक्षिप्त हो जाता है। आँखोंसे चारों ओर प्रिया-ही-प्रिया दीखती हैं। आवेशमें उन्हें हृदयसे लगाने बढ़ता हूँ, पर छवि उतनी ही दूर हट जाती है। बहुत देर बाद समझता हूँ कि यह भ्रम है। प्रिया होतीं तो मुझे व्याकुल नहीं देख सकतीं। निराश बैठता हूँ, पर प्राण और छटपटाते हैं। आज रूपने तेरी अँगूठीकी चर्चा की। यदि वह दे दे तो उसे हृदयसे लगाकर विरह-व्यथा कम करता रहूँगा।’”
मञ्जरीकी उस अँगूठीमें राधारानीका सूक्ष्म चित्र इस ढंगसे जड़ा हुआ है कि उसे आँखके पास ले जाकर देखनेसे साक्षात् रानी सामने खड़ी दीखती हैं; पर वह अनजानको नहीं दीख सकता। जो देखनेकी कला जानता हो, उसे ही दीखेगा।
English translation
Śyāmasundara asks her to come to the Yamunā bank one watch after nightfall, opposite the place where He will play His flute in the cowherd settlement. Subala will give her something to deliver to Rādhā.
First He requests her ring whose jewel contains Rādhā's portrait. Choked with tears, He explains that while Rādhā is present He forgets even Himself, but after She leaves He sees Her everywhere and reaches for a vision that recedes. Rūpa's mention of the ring made Him hope to hold it to His heart and soothe His separation.
The book notes that the ring's tiny portrait appears like Rādhā Herself when viewed close to the eye, but only to one who knows the art of seeing it.
Original
मञ्जरी कहती है, “उनकी बात सुनकर मैं स्वयं प्रेमसे रोने लगी। अँगूठी उतारकर उनकी अँगुलीमें पहनाने चली। सारा शरीर काँप रहा था। धैर्य धारण करके पहना दी और अलग खड़ी हो गयी। वे गद्गद कण्ठसे बोले, ‘तुमने आज मुझे मोह ले लिया।’
“यह सुनकर हृदय और कातर हुआ। मैं सोचने लगी कि रानीके अणु-अणुपर और उनसे सम्बद्ध समस्त वस्तुओंपर उनका अनादिसिद्ध अधिकार है। अँगूठी ही नहीं, मेरा अणु-अणु उनका है। अपनी वस्तु लेनेमें उन्हें संकोच क्यों हुआ? सोचते-सोचते इतनी अधीर हुई कि बैठ गयी। आँखोंसे आँसू बह रहे थे। वे बैठकर अपने पीताम्बरसे मेरे आँसू पोंछने लगे।
“कुछ देर बाद मुझे धैर्य हुआ। वे मुसकराकर बोले, ‘तुझे बहुत विलम्ब हो गया है। तेरी रानी बाट देख रही होगी। शीघ्र पुष्प दे दे।’ मुझे चेत हुआ और खड़ी हो गयी। उन्होंने कहा, ‘मेरे पीछे चली चल। यमुना-तटपर पहुँचा दूँगा, नहीं तो फिर रास्ता भूल जावेगी।’ वे आगे और मैं पीछे चल पड़ी। यमुना-तटपर वे प्यारसे देखते रहे। मैं संकोचसे कभी उन्हें देखती, कभी दृष्टि नीची करती। वे हँसे, ‘बावली! देर हो गयी, शीघ्र चली जा।’ फिर झाड़ीके पीछे सघन वनमें चले गये।”
English translation
Weeping, the mañjarī places the ring upon His finger. He says she has enchanted Him. She reflects that He eternally owns every particle connected with Rādhā, including her very being, and wonders why He hesitated to take His own property. Overcome, she sits and He wipes her tears with His yellow cloth.
Later He reminds her that Rādhā awaits the flowers and leads her to the Yamunā lest she lose the path. After lovingly urging the “mad girl” to hurry, He disappears into the forest.
Original
“मैं आनन्दसे पुष्प लिये लौटी। महलके पास रूपदेवी मेरी ओर दौड़ीं और बोलीं, ‘री! आज बहुत सुन्दर शृङ्गार किया है। मैं भ्रममें पड़ गयी और पहचान नहीं सकी। लगा रानी आ रही हैं।’ वे मुझपर प्यारकी वर्षा करने लगीं, हृदयसे लगाया और सिरपर हाथ फेरा। आँचल खिसक गया तो बोलीं, ‘महा भाव! तू हम सबसे अधिक चतुर हो गयी। इतनी सुन्दर वेणी मैं भी नहीं बना सकती।’
“मैं सोचने लगी, मैं तो स्नान करके कपड़े पहन, केश भीगे छोड़कर दौड़ पड़ी थी। फिर वेणी किसने बनायी, पुष्प खोंसे और अङ्गोंका शृङ्गार किया? स्मरण हुआ कि जब मूर्छित थी तब प्यारेने आँचलमें फूल भरे थे। निश्चय ही उसी समय केश सँवारे, वेणी बनायी और सजाया। यह सोचकर प्रेममें डूब गयी और रूपदेवीको सब सुनाया। उनकी आँखोंसे आँसू बह निकले। उन्होंने मुझे हृदयसे लगाया, बार-बार होठ चूमे और कहा, ‘चल, रानीके पास ले चलूँ। सायंकाल सब सुना देना।’
“रूपदेवीके साथ तुम्हारे पास आयी। मुझे देखते ही तुम्हें प्यारे श्यामसुन्दरकी अङ्ग-गन्ध मिली और तुम मूर्छित...”
English translation
Returning with the flowers, she meets Rūpadevī, who initially mistakes her for Rādhā because of her exquisite braid and adornment. The mañjarī realizes that while she was unconscious Śyāmasundara must have arranged her hair, placed the flowers, and decorated her. On hearing the story, Rūpa embraces and kisses her and brings her to Rādhā. The fragrance of Śyāmasundara's limbs upon her had made Rādhā faint.
Original
मञ्जरी यह कह ही रही थी कि रानीने दोनों हाथ बढ़ाकर उसे हृदयके पास खींच लिया। प्रेमके कारण उनकी दशा विचित्र हो गयी। मानो उसे हृदयके भीतर घुसा लेना चाहती हों, ऐसे कसकर चिपटा लिया। मञ्जरी प्रेममें इतनी संलीन हुई कि बोल न सकी। सभी सखियाँ एवं मञ्जरियाँ सुनते-सुनते श्यामसुन्दरके ध्यानमें इतनी तल्लीन हो गयीं कि अधिकांश बाह्य ज्ञान खो बैठीं।
इसी समय ललिता एवं अन्य मञ्जरियोंके साथ प्यारे श्यामसुन्दर घाटपर आ पहुँचते हैं; पर इतनी नीरवता है मानो सखी-मण्डली समाधिमें हो। किसीको पता नहीं चला। श्यामसुन्दर दबे पाँव घाटसे नीचे उतरकर चित्राके बगलमें बैठते और दोनों हाथोंसे रानीकी आँखें पीछेसे मूँद लेते हैं। प्रियतमका कर-स्पर्श पाकर रानी चौंकती हैं, फिर सोचती हैं किसने आँखें मूँदीं? प्राणनाथ तो नहीं; वे अभीतक सम्भवतः नहीं आये होंगे। हँसकर कहती हैं, “हाँ, हाँ, पहचान गयी। ललिता? ना, ना, चित्रा?”
रानी हाथ ऊपर उठाकर कलाईके पास ले जाती हैं। हाथ श्यामसुन्दरके वक्षसे छूते ही अकचकाकर कहती हैं, “अरे!” बल लगाकर हाथोंको आँखोंसे हटाती हैं और श्यामसुन्दरको देखती हैं।
English translation
Rādhā pulls the narrator tightly to Her heart as though drawing her inside. Everyone becomes absorbed in meditation and loses outer awareness.
Śyāmasundara arrives silently with Lalitā and the mañjarīs, sits beside Citrā, and covers Rādhā's eyes from behind. She guesses Lalitā and Citrā, believing Her beloved has not yet come. When Her raised hands touch His chest, She cries out and pulls His hands away.
Original
रानी हँसती हुई शीघ्र खड़ी हो जाती हैं। सभी सखियाँ एवं मञ्जरियाँ भी खड़ी होती हैं। श्यामसुन्दर रानीको हृदयसे लगा लेते हैं। गलबाँही डाले हुए प्रिया-प्रियतम सीढ़ियोंसे घाटके ऊपर आते हैं। वृन्दादेवी सबको ऊपरकी अतिशय सुन्दर सजी वेदीपर ले जाती हैं। प्रिया-प्रियतम पैर नीचे लटकाकर बैठते हैं। वृन्दा एवं दासियाँ सेवामें लगती हैं। मधुमती मञ्जरी वीणाके तार छेड़ती हुई अतिशय सुरीले कण्ठसे गाती हैं:
English translation
Laughing, Rādhā rises and Śyāmasundara embraces Her. With arms around one another, They ascend to a beautifully decorated platform. Vṛndā and her servants begin Their service, while Madhumatī Mañjarī plucks the vīṇā and sings:
Original
Braj Bhāṣā song
नन्द-कुल-चन्द वृषभानु-कुल-कौमुदी, उदित वृन्दा-विपिन विमल अकासे।
निकट बैठित सखि-वृन्दकर-चारिका, लोचन चकोर तिन रूप-रस-प्यासे॥
रसिक-जन-अनुराग-उदधि तजि मरजाद, भाव अगनित कुमुदिनी-गन-विकासे।
कहि गदाधर सकल विश्व मसुरनि बिना, भानु भव-ताप अज्ञान न बिनासे॥
English translation
The moon of Nanda's line and the moonlight of Vṛṣabhānu's line have risen in the stainless sky of Vṛndāvana's groves.
The surrounding sakhīs move near Them, their cakora-like eyes thirsting for the nectar of Their beauty.
The ocean of the rasikas' love abandons all bounds, while countless night-lotuses of feeling open.
Gadādhara says: Without these radiant Ones, the world's darkness remains, and the sun cannot destroy the heat of becoming or the night of ignorance.