Original
Sanskrit invocation
॥ विजयेतां श्रीप्रियाप्रियतमौ ॥
English translation
May Śrī Priyā and Her most beloved Lord be ever victorious.
Original
सूर्य-पूजन लीला
अतिशय रमणीय सुन्दर उद्यानमें पूर्वाभिमुख सूर्य-मन्दिर स्थित है। मन्दिर सुन्दर संगमरमर पत्थरोंका बना हुआ है। मन्दिरकी बाहरी दालानकी सीढ़ियोंपर सखी-मण्डली-सहित राधारानी विराजमान हैं। रानीका मुख पूर्व एवं दक्षिणके कोनेकी ओर है। वे दालानके एक खंभेसे पीठ टेककर एवं सीढ़ियोंपर पैर लटकाये बैठी हैं। रानीकी दाहिनी तरफ चित्रा खड़ी हैं। अन्यान्य सखियाँ रानीको घेरे-सी रहकर कुछ सीढ़ियोंपर एवं कुछ दालानमें बैठी हैं। सीढ़ियोंके बिलकुल नीचे संगमरमरके बेंचके आकारका आसन है। उसपर ललिता उत्तरकी ओर मुख किये तथा पैर लटकाये बैठी हैं।
उद्यानमें तमाल, मौलश्री, आम्र, कदम्ब आदिके हरे-हरे बड़े-बड़े वृक्ष जगह-जगह लगे हुए हैं। स्थान-स्थानपर क्यारियोंमें नाना प्रकारके अतिशय सुन्दर, सुगन्धित, रंग-बिरंगे पुष्प खिल रहे हैं, जिनपर भ्रमरोंकी टोली मँडरा रही है। उद्यान पक्षियोंके सुन्दर कलरवसे गुञ्जित हो रहा है। एक पक्षी अतिशय सुरीले कण्ठसे अविराम बोल रहा है। उसकी ओर ध्यान देनेपर ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो पक्षी प्यारभरे हृदयसे आलाप लेकर पुकार रहा है, “गोपीनाथ! गोपीनाथ!! गोपीनाथ!!!”
मन्दिरके सामनेसे पूर्वकी ओर सीधे एक चौड़ी रविश (छोटी सड़क) उद्यानके पूर्वी फाटकतक गयी हुई है तथा उससे कुछ कम चौड़ी रविश दक्षिणी एवं उत्तरी फाटकतक भी बनी हुई है। अतिशय सुन्दर मल्लिका एवं कुन्द-पुष्पोंकी लम्बी क्यारियाँ रविशके किनारे-किनारे लगी हुई हैं। मन्दिरके सामने सूर्यमुखी पुष्पोंकी एक-एक क्यारी सड़कके दोनों किनारोंपर शोभा पा रही है। वृक्षोंकी कद तो छोटी है, पर उनमें इतने सुन्दर एवं इतने बड़े फूल लग रहे हैं कि देखनेसे प्रतीत होता है मानो फूलके छोटे-छोटे झाड़ वृक्षोंपर सजा दिये गये हों।
English translation
The Worship of the Sun
In a beautiful garden stands an east-facing temple of fine marble. Rādhārānī sits with Her sakhīs on the steps of its outer veranda, leaning against a pillar, Her feet hanging down and Her face turned southeast. Citrā stands to Her right. Other sakhīs sit around Her on the steps and veranda. Below, Lalitā sits facing north upon a marble bench.
Large tamāla, bakula, mango, and kadamba trees grow throughout the garden. Beds of fragrant, many-colored flowers teem with hovering bees, while birdsong fills the air. One bird calls without pause in an exceptionally melodious voice, as if crying from a loving heart, “Gopīnātha! Gopīnātha! Gopīnātha!”
A broad path runs east from the temple to the garden gate, with slightly narrower paths to the northern and southern gates. Long beds of jasmine and kunda flowers border them. Beds of sunflowers adorn both sides before the temple. Though the plants are short, their blossoms are so large and beautiful that they resemble little flowering shrubs set upon trees.
Original
रानीके मुखारविन्दपर गम्भीरता छायी हुई है; छोटे-छोटे स्वेदकण कपोलोंपर झलमल करते हुए दीख पड़ रहे हैं। रानीके चरणोंके पास बैठी हुई विलासमञ्जरी पुष्पोंके बने हुए पंखेसे धीरे-धीरे हवा कर रही है।
उधर उद्यानके पूर्वी फाटकपर रूपमञ्जरी खड़ी है। रूपमञ्जरीके बगलमें एक और मञ्जरी खड़ी है। रूपमञ्जरी उसीके कंधेपर हाथ रखे हुए उत्तर-दक्षिणकी ओर जो पगडंडी वनमें जाती है, उसीकी ओर कभी उत्तरकी तरफ, कभी दक्षिणकी तरफ बार-बार देख रही है। वह इस प्रतीक्षामें खड़ी है कि इस रास्तेसे ऋषियोंके शिष्य आते-जाते रहते हैं। कोई मिल जाये तो उसे प्रार्थना करके ले जाऊँ, जिससे रानीकी सूर्य-पूजाका कार्य सम्पन्न हो सके। यदि कोई आश्रमकुमार नहीं मिला, फिर तो बाध्य होकर अपने-आप पूजा करनी ही पड़ेगी; पर मिल जाये तो अच्छी बात है। किसी ऋषिकुमारकी बाट देखनेमें यह भी एक उद्देश्य है कि इस प्रकार देरी हो जायेगी और दिनका अधिकांश समय वनमें बीत जायेगा, क्योंकि वनमें रानीको सान्त्वना देनेमें सखियोंको ज्यादा सुविधा रहती है।
इसी समय उत्तरकी ओरसे एक ऋषिकुमार आता हुआ दिखायी पड़ता है। रूपमञ्जरी उसी ओर देखती रहती है। निकट आनेपर वह बड़ा सुन्दर दीखता है। रंग साँवला है। काले-काले सुन्दर केश कंधोंपर पीछे लटक रहे हैं। आँखोंसे इतनी सरलता टपक रही है, मानो वह पाँच वर्षका भोला-भाला शिशु हो। तेजसे मुख दम-दम कर रहा है। उम्र पंद्रह साल प्रतीत होती है। दोनों चरण इतने सुकोमल हैं मानो गुलाबकी पंखुड़ी हों।
रूपमञ्जरी उसे देखकर एक बार तो स्तब्ध हो जाती है, फिर सँभलकर उसकी ओर देखने लगती है। ऋषिकुमार निकट आकर रुकता है एवं मधुरतम कण्ठसे पूछता है, “देवि! क्या तुम बता सकती हो कि महर्षि शाण्डिल्यके आश्रमकी ओर कौन-सी पगडंडी जायेगी?”
English translation
Gravity covers Rādhā's lotus face, and tiny beads of perspiration shimmer on Her cheeks. Seated near Her feet, Vilāsamañjarī gently fans Her with a flower fan.
At the eastern gate Rūpamañjarī stands with her hand upon another mañjarī's shoulder, repeatedly searching both north and south along the woodland path. Disciples of sages pass this way, and she hopes to invite one to officiate at Rādhā's sun worship. Otherwise they must perform it themselves. Waiting also delays them so that most of the day may pass in the forest, where the sakhīs can more easily console Rādhā.
A young ascetic approaches from the north. He is remarkably beautiful and dark-complexioned, with lovely black hair falling over His shoulders. Such innocence flows from His eyes that He resembles a guileless five-year-old, though He appears about fifteen. His radiant face glows, and His feet are as tender as rose petals. Rūpamañjarī is struck motionless. Coming near, He asks in the sweetest voice, “Devī, which path leads to Maharṣi Śāṇḍilya's āśrama?”
Original
रूपमञ्जरीने ऐसा मधुर कण्ठ कभी सुना ही नहीं था। वह मन्त्रमुग्ध-सी हो गयी; बड़ी मुश्किलसे बोल सकी, “क्यों, आप कौन हैं?”
ऋषिकुमारने कहा, “देवि! मैं महर्षि शाण्डिल्यका शिष्य हूँ। गुरुदेवने मुझे प्रातःकाल पुष्प लानेके लिये वनमें भेजा था। आज्ञा थी, ‘बेटा! सुन्दर-से-सुन्दर पीले रंगके पुष्प लाना। उत्तरकी तरफ वनमें आगे बढ़नेसे तुम्हें सुन्दर पीले पुष्प मिलेंगे।’ मैं उनकी आज्ञासे चलता हुआ वनमें बहुत दूर निकल गया। पुष्प तो मिल गये, पर राह भूल गया। घूम-फिरकर यहीं चला आता हूँ। पता नहीं किस दिशामें जाऊँ; दिग्भ्रम हो रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि सूर्य आज पश्चिमसे पूर्वकी ओर चल रहे हैं। न तो कुछ खाया है, न जल पी सका हूँ। पुष्पोंका दोना हाथमें लिये वनमें मारा-मारा फिर रहा हूँ।”
ऋषिकुमारकी वाणीसे अमृत झर रहा है। वे शब्द रूपमञ्जरीके हृदयपर मानो अधिकार करते जा रहे हैं। उसके मनमें किसी अहेतुक अनिर्वचनीय सरसताका उदय होने लगता है। वह कहती है, “ऋषिकुमार! आप महर्षि शाण्डिल्यके शिष्य हैं, पर मैंने आपको कभी नहीं देखा। महर्षिके दर्शन तो प्रतिदिन होते हैं। उनके आठ-दस शिष्योंको भी मैं बहुत अच्छी तरह पहचानती हूँ।”
ऋषिकुमार बोले, “देवि! इसीलिये तो आज राह भूला हूँ। महर्षि मुझपर अत्यधिक स्नेह करते हैं और सारे दिन-रात मुझे अपने हृदयमें छिपाये रखना चाहते हैं। इसीलिये मुझे कभी आश्रमके बाहर जानेकी आज्ञा नहीं मिली। आश्रमके पास एक सुन्दर रमणीय उद्यान है। उसकी प्रत्येक वस्तु और अणु-अणुसे परिचित हूँ, पर बाहर कभी नहीं निकला। उन्हींसे सुना है कि वे प्रतिदिन नन्दरायजीके घर जाया करते हैं। मैंने कई बार प्रार्थना की कि गुरुदेव, एक बार मुझे भी साथ चलनेकी आज्ञा दो। पर वे कहते, ‘ना, बेटा! मेरे इस उद्यानसे तुम्हारे चले जानेपर यह बिलकुल सूना हो जायेगा। विधाताने न जाने किस पुण्यका फल दिया है कि तुम मेरे शिष्य बने हो।’
“पर कल रात गुरुदेवको कोई स्वप्न हुआ। उसके फलस्वरूप उन्होंने मुझे हृदयसे लगाकर प्रातःकाल पुष्प लानेकी आज्ञा दी। अब मैं रास्ता भूल गया हूँ और वे मेरी प्रतीक्षामें अत्यन्त व्याकुल हो रहे होंगे। शीघ्र रास्ता बता दो; मैं तुम्हारा बहुत ऋणी होऊँगा।”
English translation
Rūpamañjarī has never heard such a voice. Spellbound, she can barely ask who He is.
He replies, “I am Maharṣi Śāṇḍilya's disciple. At dawn Gurudeva sent me to gather the loveliest yellow flowers northward in the forest. I found them, but wandered far and lost the path. Now even the directions confuse me, as if the sun were moving from west to east. I have neither eaten nor drunk, and roam carrying this leaf bowl of flowers.”
Nectar seems to fall from His words and claim her heart. She asks why she has never seen Him despite meeting the sage and knowing his other disciples.
He says, “That is why I lost the way. Maharṣi loves me so deeply that he wishes to hide me in his heart day and night, and has never allowed me outside. I know every particle of the lovely garden beside his āśrama, but nothing beyond it. I have heard that he visits Nandarāya's home daily. When I begged to accompany him, he said the garden would become desolate without me and wondered what merit had brought him such a disciple.
“Last night he had a dream. He embraced me and ordered me to gather flowers this morning. Now he must be anguished while waiting. Show me the path quickly, and I shall be deeply indebted.”
Original
इसी समय ललिता वहाँ आ पहुँचती हैं। रूपमञ्जरीको देर होते देखकर वे रानीके पाससे फाटककी ओर चली आयी थीं। रूपमञ्जरी बातोंमें इतनी संलग्न थी कि ललिताको नहीं देख सकी, पर ऋषिकुमारकी दृष्टि उनपर पड़ चुकी थी। बात समाप्त करके रूपमञ्जरीकी ओर पथ दिखलानेके उद्देश्यसे देखते ही ललिता सामने चली आयीं। वे घुटने टेककर ऋषिकुमारको प्रणाम करती हैं तथा कहती हैं, “ऋषिकुमार! मैं आपको प्रणाम कर रही हूँ। मैंने आपकी सारी बातें सुन ली हैं। मैं अपनी एक खास दासी आपके साथ कर दूँगी। वह आपको महर्षि शाण्डिल्यके आश्रमतक पहुँचा आयेगी; पर मैं आपको बिना कुछ खिलाये-पिलाये नहीं जाने दूँगी। आप रास्ता भूलकर आजसे बहुत भटके हैं। आपका मुख सूख गया है। किंचित् कलेवा करके जल पी लें तथा किंचित् विश्राम कर लें, फिर मैं सब व्यवस्था कर दूँगी।”
ऋषिकुमारने कहा, “देवि! आप तो असम्भव-सी बातें कर रही हैं। गुरुदेवकी आज्ञाके बिना मैं अन्न-जल ग्रहण करूँ, यह कैसे हो सकता है?”
ऋषिकुमारने सिर नीचा करके दृढ़तासे यह बात कही तो ललिता झेंप गयीं; पर उसके मुखपर इतना विचित्र आकर्षण है कि ललिताका मन बरबस उसकी ओर खिंचता जा रहा है। वे सोचती हैं, “ओह! यह ऋषिकुमार सचमुच कितना दृढ़ है। पर इसे बिना कुछ खिलाये-पिलाये जाने देनेकी बातसे मेरे प्राण छटपटा रहे हैं। अच्छा, इसे एक बार सखी राधाके पास ले चलूँ। वहाँ जैसा होगा, विचार करूँगी।”
वे कहती हैं, “अच्छी बात है, ऋषिकुमार! आपकी जैसी प्रसन्नता; पर मन्दिरके पास मेरी सखियाँ हैं। कृपया वहाँ चलें। वहीं मैं सब व्यवस्था कर दूँगी। रास्ता उधरसे ही है।”
ऋषिकुमार बोले, “पर देवि! विशेष विलम्ब नहीं हो, यह ध्यान रखना।”
ललिताने कहा, “बिलकुल नहीं, शीघ्र व्यवस्था कर दूँगी।”
English translation
Lalitā now arrives, having come from Rādhā to learn why Rūpamañjarī was delayed. Bowing on one knee, she offers to send a trusted maid to guide the young ascetic home, but insists that He first eat, drink, and rest after wandering so long.
He firmly replies that He cannot accept food or water without Gurudeva's command. Lalitā is abashed, yet the strange attraction of His face draws her mind. The thought of sending Him away hungry makes her life tremble. Deciding to take Him before Rādhā, she asks Him to come to the temple, which lies along His route. He agrees only if there is no long delay, and Lalitā promises haste.
Original
ललिता आगे-आगे चलती हैं; पीछे ऋषिकुमार, रूपमञ्जरी एवं अन्य मञ्जरियाँ चल रही हैं। मन्दिरके पास पहुँचकर ऋषिकुमारके सौन्दर्यको देखकर सभी सखियाँ उठ पड़ती हैं। रानी भी उसकी ओर देखने लग जाती हैं। तभी उद्यानके दक्षिणी फाटककी ओरसे एक वृद्धा आ पहुँचती है। उसे देखकर सभी सखियाँ एवं रानी बड़े आदर और विनयसे खड़ी हो जाती हैं। वृद्धाके शरीरपर उजले रंगकी बिना पाड़की साड़ी है, गलेमें तुलसीकी माला तथा दाहिने हाथमें एक छड़ी। उसके बाल प्रायः सफेद हो गये हैं, अवश्य ही मुखाकृतिपर केवल एक-दो झुर्रियाँ दीख पड़ रही हैं।
सीढ़ीके नीचे जिस आसनपर पहले ललिता बैठी थीं, उसीपर ऋषिकुमार बैठ जाता है, मानो बिलकुल थक गया हो। वृद्धा उसके बगलमें खड़ी होती है, पर उसकी दृष्टि नीचे उत्तरकी तरफ लगी है, अतः वह नहीं देखता। वृद्धा सीढ़ियोंपर चढ़कर ललिताको बुलाती और धीरेसे पूछती है, “बेटी! यह ऋषिकुमार कौन है?” ललिता सारी बातें बता देती हैं। वृद्धा आश्चर्यसे सुनकर पूछती है, “इनका नाम क्या है?” ललिता कहती हैं, “नाम नहीं पूछ पायी हूँ।”
वृद्धा कहती है, “पूछ तो सही।” ललिता हाथ जोड़कर पूछती हैं, “ऋषिकुमार! हम लोगोंकी माँ आपका नाम जानना चाहती हैं।”
ऋषिकुमार बड़ी गम्भीरतासे कहता है, “हमें लोग ब्रह्मचारी मन्मथमोहन् कहते हैं।”
यह सुनते ही वृद्धा चटपट सीढ़ियोंसे उतरती हुई “अहो भाग्य! अहो भाग्य!” चिल्लाकर ऋषिकुमारके चरणोंके पास गिर पड़ती है और कहती है, “बेटी! ऋषिकुमारके चरणोंकी धूलि बटोर ले। पीछे सब बात बता दूँगी। ओह, धन्य हैं! ऋषिकुमार, विधाताने असीम कृपा की कि आपने अपने-आप दर्शन दे दिया।”
वृद्धा चरणोंसे लिपटनेके लिये बढ़ती है, तभी ऋषिकुमार पीछे हटकर सरलता और गम्भीरतासे कहता है, “माँ! आप क्या कर रही हैं? ब्रह्मचारीके लिये स्त्री-स्पर्श सर्वथा निषिद्ध है।”
English translation
Lalitā leads Him to the temple, followed by Rūpamañjarī and the mañjarīs. All rise at His beauty, even Rādhā looking toward Him. An elderly woman enters from the southern gate, and everyone stands respectfully. She wears an unbordered white sari, tulasī beads, and carries a staff. Her hair is nearly white, though only a few wrinkles mark her face.
The ascetic sits upon Lalitā's former bench as if exhausted. The woman quietly asks Lalitā who He is and then requests His name. He gravely answers, “People call me the brahmacārī Manmathamohana.”
Crying, “What fortune!” the woman rushes down and falls near His feet, telling Lalitā to gather their dust. As she moves to embrace them, He steps back and says with innocent gravity, “Mother, what are you doing? Contact with women is wholly forbidden to a brahmacārī.”
Original
ये शब्द वृद्धाके हृदयमें जादूका-सा काम करते हैं। उसकी आँखोंसे आँसुओंकी धारा बहने लगती है। वह गद्गद कण्ठसे कहती है, “तभी तो कह रही हूँ कि आपका दर्शन बड़े भाग्यसे मिला है। थोड़ी देर पहले आपके गुरुभाई मध्वानन्दजी ब्रह्मचारीसे मिलकर आपके विषयमें सब सुन चुकी हूँ।”
ऋषिकुमार पूछता है, “माँ! मध्वानन्द तुम्हें कहाँ मिला?” वृद्धा कहती है, “आपके गुरुदेवने आपको खोज लानेके लिये उन्हें भेजा है। आज्ञा है कि जहाँ मन्मथमोहन् मिले, वहीं उसे कुछ खिला-पिला देना। वह भूखा-प्यासा होगा। तुरंत खा-पी ले, नहीं तो मैं बहुत दुःखी होऊँगा। गुरुदेवने भगवत्प्रसाद एवं जल भी भेजा है। मध्वानन्दजी थोड़ी देरमें स्वयं यहीं आ सकते हैं।”
ऋषिकुमार प्रसन्न होकर कहता है, “माँ! उनको तो हमपर अपार कृपा है ही। अब मध्वानन्दकी बाट देखनी पड़ेगी, नहीं तो वह मुझे ढूँढ़ता भटकेगा।” वृद्धा निवेदन करती है कि मध्वानन्दने उसकी बहुत-सी बातें बतायी हैं। वह सरल हँसी हँसकर कहता है, “मध्वानन्द आधा पागल है। माँ! उसकी बातपर विश्वास मत करना।”
वृद्धा अपने घरकी द्वादशवर्षीय सूर्य-पूजामें आचार्य बननेका आग्रह करती है। ऋषिकुमार असम्मति प्रकट करता है, पर बड़ी कठिनतासे आज पूजा करा देनेकी हामी भरता है। तभी एक सुन्दर बालक दक्षिणसे आकर वृद्धाको प्रणाम करता है, “माँ! आज हम लोगोंकी यमुना-पूजा आरम्भ होगी। एक मास लगातार पूजा होगी। मैं रायाणघाटसे आपके घर गया। सूचना मिली कि आप सूर्य-मन्दिरमें हैं। खेत जाना हो तो तुरंत चलें। नावसे पार उतार दूँगा; एक घड़ीमें लौटना होगा, क्योंकि तीन घड़ी दिन बाकी रहते नावका खेना बंद हो जायेगा।”
English translation
His words make the woman weep. She explains that His fellow disciple Madhvānanda has told her about Him. Gurudeva sent Madhvānanda to find Him with prasāda and water and the command that He eat at once. Manmathamohana agrees to wait, joking that Madhvānanda is half mad.
The woman asks Him to officiate at the twelve-year sun worship in her home. He refuses, but finally agrees to perform today's worship. A boy then arrives from Rāyāṇa-ghāṭa. Their monthlong Yamunā worship begins today, and if she must visit the fields they must leave before the ferry closes.
Original
illustration plate
केलि कुञ्ज
विजयतां श्रीप्रियाप्रियतमौ
English translation
The Bower of Divine Play.
May Śrī Priyā and Her most beloved Lord be victorious.
Original
वृद्धा विचारमें पड़ जाती है। उसका मुख उदास देखकर ऋषिकुमार कहता है, “माँ! तुम्हारा मन चिन्तित हो गया है। अच्छा, कल एक दिन और आ जाऊँगा।” वृद्धा प्रसन्न होकर चरणोंमें नमस्कार करती है, “आपने बड़ी कृपा की, पर कल आनेका वचन न भूलेंगे। मैं आवश्यक कामसे जा रही हूँ। आजकी पूजा सम्पन्न करावें।”
वह एक किनारे ललिताको समझाती है कि सेवामें त्रुटि न हो, पूजा जैसे-जैसे कराये वैसे करना तथा पंद्रह मुहरोंकी दक्षिणा देना। फिर कहती है, “कल आनेके आश्वासनसे ही आपको छोड़कर खेतपर जा रही हूँ। आप नहीं आयेंगे तो अपार दुःख होगा।” ऋषिकुमार हँसकर कहता है, “कलके लिये वचन हो चुका, निश्चिन्त रहें।” वृद्धा और बालक दक्षिणकी ओर चले जाते हैं।
ऋषिकुमार पूजा कराने चलता है। रानी बड़े प्रेमसे उसे देखती हैं। रह-रहकर उसके स्थानपर प्रियतम श्यामसुन्दर खड़े दीखते हैं। वे काँपकर सोचती हैं कि यह विरहावस्थाका भ्रम है। रानी उसके पैर धोने लगती हैं, पर वह पीछे हटकर कहता है, “देवि! मैं स्त्रियोंका स्पर्श नहीं करता।” ललिता कहती हैं, “क्षमा करना। मेरी सखीको उन्मादका रोग है; अधिकांश समय होशमें नहीं रहती।” ऋषिकुमार मुसकराता है, रूपमञ्जरीकी झारी उठाकर अपने हाथ-पैर धोता और शीघ्रतासे मन्दिरमें चला जाता है। एक मञ्जरी रानीके पैर धोती है और रानी भी भीतर जाती हैं।
English translation
Seeing her worry, He promises to return tomorrow. She asks Lalitā to serve Him exactly as directed and give fifteen gold coins as dakṣiṇā, then departs with the boy.
Rādhā watches Him lovingly and repeatedly sees Śyāmasundara in His place, though She dismisses it as separation's delusion. When She tries to wash His feet, He withdraws because He does not touch women. Lalitā apologizes for her friend's divine madness. Smiling, He washes His own hands and feet and enters the temple; Rādhā follows.
Original
सूर्य-मन्दिरके भीतर सुन्दर कोठरी-सी है, जिसमें दो गज ऊँची वेदीपर भगवान् सूर्यकी अतिशय सुन्दर प्रतिमा घोड़ेके रथपर बैठायी हुई है। रथ, घोड़े एवं प्रतिमा सुनहले रंगकी तेजस्वी धातुके बने हैं। प्रतिमाका मुख पूर्वकी ओर है। वेदीके पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दो-दो हाथ तथा पूर्व चार हाथका स्थान संगमरमरके घेरेसे घेरा है। पूर्वकी ओर द्वार है। घेरा तीन हाथ ऊँचा है। उसीके भीतर ऋषिकुमार और बाहर दक्षिणाभिमुख रानी खड़ी हैं। बाहर विविध पूजा-सामग्री भरी है।
पूजा आरम्भ होती है। रानी जल, अक्षत, सुपारी एवं पीला पुष्प ऋषिकुमारके हाथमें डाल देती हैं। वह मुसकराता हुआ ऊटपटांग ढंगसे संकल्प-पाठ करता और अन्तमें विनोदसे उच्चारण करता है:
श्रीराधायाः दासस्य कृष्णस्य सकलकामना-सिद्ध्यर्थं श्रीसूर्यदेवस्य पूजनमहं करिष्यामि।
(श्रीराधाके दास कृष्णकी सभी कामनाओंकी पूर्तिके लिये मैं सूर्य-पूजन करूँगा।)
सभी आश्चर्यसे उसे देखने लगती हैं। रानी ललिताके कानमें कहती हैं, “मेरा सिर घूम रहा है। पता नहीं यह कौन है? कहीं वे ही हों तो...” ललिताको भी संदेह है, पर सरल मुख कृत्रिम मानना असम्भव जान पड़ता है। वह कहती हैं, “ऐसी मुखाकृति कृत्रिम हो, यह असम्भव-सा दीखता है।” चित्रा कहती हैं, “मैं ठीक कहती हूँ, ये श्यामसुन्दर हैं!”
English translation
Inside, a six-foot altar bears a radiant golden image of Sūrya upon a horse-drawn chariot. A three-foot marble enclosure surrounds it. The ascetic stands inside and Rādhā outside amid the offerings.
She gives Him water, rice, betel nut, and a yellow flower. Smiling, He recites a deliberately peculiar saṅkalpa: “I shall worship Śrī Sūryadeva for the fulfillment of every desire of Kṛṣṇa, the servant of Śrī Rādhā.” Everyone stares. Rādhā wonders whether He is Śyāmasundara. Lalitā doubts that so innocent a face could be artificial, but Citrā insists it is He.
Original
ऋषिकुमार कहता है, “देवि! विलम्ब हो रहा है, शीघ्र अन्य सामग्री दो।” वह मन्त्र पढ़-पढ़कर पूजा करवाता है। चित्रा ललिताको उत्तरी हिस्सेमें ले जाकर कहती हैं, “ये निश्चय ही श्यामसुन्दर हैं।” ललिता पूछती हैं कि मुखाकृति और बोली कैसे बदल सकती है। चित्रा कहती हैं, “ये इतनी चतुराईसे वेष एवं मुखाकृति बदल सकते हैं कि कोई पहचान नहीं सकता। मैं इन्हें ऐसे विचित्र ढंगसे बोलते सुन चुकी हूँ कि कोई समझ नहीं सकता।”
“पहचान कैसे हो?”
“पुष्पाञ्जलिके समय पुष्पके बदले जल उठाकर सूर्यपर फेंकनेके बहाने ऋषिकुमारपर फेंकें। रंग होगा तो उतर जायेगा।” ललिता “बहुत ठीक” कहकर घेरेके पास आती हैं।
ऋषिकुमार प्रत्येक पदार्थके अर्पणसे पहले ऊटपटांग-सा पद पढ़कर कहता है, “पाद्यं समर्पयामि, सूर्याय नमः। अर्घ्यं समर्पयामि, सूर्याय नमः।” उसके पाठसे श्रीप्रियाका हृदय उद्वेलित होकर वे भावाविष्ट होने लगती हैं।
पूजा समाप्तप्रायः है। विशाखा बड़ी परात भीतर रखती हैं। उसमें पीले रंगके अतिशय सुन्दर फल हैं, जो संतरेके-से, पर कुछ बड़े हैं। ऋषिकुमार परात उठाकर गाता है:
तालफलादपि गुरुमतिसरसम्। (गोविन्द)
फिर कहता है, “ऋतुफलं समर्पयामि, सूर्याय नमः।”
English translation
The ascetic calls for the remaining articles. Citrā tells Lalitā that Śyāmasundara can alter His face and voice beyond recognition, and they plan to throw water at Him during the flower offering.
His formulas include, “I offer water for washing the feet. Obeisance to Sūrya. I offer the arghya. Obeisance to Sūrya.” Priyā becomes deeply moved. Near the end Viśākhā brings large yellow fruits resembling oversized oranges. He sings Govinda's line, “Weightier and more luscious even than a palmyra fruit,” then offers the seasonal fruit to Sūrya.
Original
रानी तीक्ष्ण दृष्टिसे ऋषिकुमारको देखकर खिलखिलाकर हँस पड़ती हैं। उन्हें निश्चय हो गया कि प्राणनाथ श्यामसुन्दर ही ऋषिकुमार बनकर आये हैं। प्रेममें अधीर होकर वे धम्मसे बैठकर आँखें बंद कर लेती हैं। ऋषिकुमारके मुखसे सरलता एवं गम्भीरता चली जाती है; वह भी जोरसे हँस पड़ता है। चित्रा झारीसे एक गिलास पानी उसके मुखपर झोंक देती हैं। वह उत्तरीय वस्त्रसे मुख पोंछता है और श्यामसुन्दरका अनिन्द्य मुख स्पष्ट दीखने लगता है।
इन्दुलेखा वहीं मूर्छित हो जाती हैं। विशाखा आदि हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाती हैं। रानी उठकर प्यारे श्यामसुन्दरको घेरेसे बाहर खींच लेती हैं। सर्वत्र आनन्द एवं प्रेम छा जाता है। सखी-मण्डली उन्हें मन्दिरके पीछे सुन्दर कुण्डपर ले जाती है। रानी वृक्षकी छायामें बैठाकर अँगोछेसे उनका शरीर पोंछती हैं। सखियाँ पुनः श्यामसुन्दरका शृङ्गार करती हैं और निर्मल प्रेमसे भरा विशुद्ध विनोद चलता रहता है।
English translation
Rādhā looks sharply and bursts into laughter, certain Her beloved has come disguised. He too laughs. Citrā flings water over His face, and when He wipes it, Śyāmasundara's incomparable face appears.
Indulekhā faints and the others roll with laughter. Rādhā draws Him outside. At the pond behind the temple She dries Him beneath a tree, and the sakhīs adorn Him again amid pure loving play.
Original
इसी समय एक सारिका वृक्षके ऊपर बोलती है, “सूर्यदेव! तुमने प्रतिज्ञा कर ली है कि मैं जो कहूँगी, उससे ठीक उलटा करोगे। प्रातःकाल हृदयसे कह रही थी कि तुम देरसे उदय हो तो शीघ्र उदय हो गये। अब कह रही हूँ, थोड़ा ठहरो, मन्थर गतिसे चलो, तो पश्चिम गगनकी ओर शीघ्र भागे जा रहे हो। क्या कहूँ?”
सबकी दृष्टि सूर्यकी ओर जाती है और होश होता है कि दिन अधिक ढल चुका है। रानीका मुख गम्भीर हो जाता है। श्यामसुन्दर उन्हें हृदयसे लगाकर कहते हैं, “मैं शीघ्र ही गायोंको लेकर आ रहा हूँ।” आवेशसे उनका गला भर आता है। रानीको बाँयी तरफ सँभाले वे उत्तरके छोटे फाटकपर पहुँचते हैं। पुनः हृदयसे लगाकर फाटकसे बाहर धीरे-धीरे पूर्वकी ओर राजपथपर चलते हैं।
रानी बाहर खड़ी निर्निमेष देखती हैं। श्यामसुन्दर इन्दुलेखाके कुञ्जकी पूर्वी सीमाके पास गिरिवर-स्रोतका पुल पार करके उत्तरकी तरफ चले जाते हैं। जब वे नहीं दीखते, रानी कटे वृक्षकी तरह गिरती हैं; पर ललिता सँभाल लेती हैं। कुछ देर बाद ललिता उन्हें उठाती हैं। रानी उनके कंधेको पकड़कर धीरे-धीरे घर जानेके लिये पश्चिमकी ओर राजपथपर चलती हैं।
English translation
A mynah calls, “Sūryadeva, you do the opposite of whatever I ask. At dawn I wished you to rise late, and you rose quickly. Now I beg you to linger, yet you race toward the west. What can I say?”
Everyone realizes how far the day has declined. Śyāmasundara embraces Rādhā and promises to return soon with the cows, His throat filling with emotion. He embraces Her once more at the northern gate and departs eastward.
Rādhā watches as He crosses the Girivara stream near Indulekhā's bower and disappears northward. She falls like a felled tree, but Lalitā catches Her. Later, holding Lalitā's shoulder, She slowly takes the western road home.