English translation forthcoming. Hindi original below.
अहो | रंतिदेव नप सन्त दुसकंत बंस अति ही प्रशंस सो १ (श्लोक) इच्वाकुरेलमुचुकुन्द्विदेहगाधिरघध्वम्बरीषसगरा गयनाहुषाद्या। । मान्धाचलके- शत्धन्वलुरन्तिदेवा देववतो बलिस्सृतरयों दिलोपः ॥॥ सोभयु तंकशिविदेवलपिप्पलादूखार- स्वतोद्धवपराशरभूरिषेणाः । येउन्ये विभीष णहनूमदुपेन्द्रदत्तराथा शिंषेण विदुर भ्रतिदेव बयां ॥श॥ 'ते-वे-पविद्नत्यतितरन्ति च देवमायां ख्रीशुद्रहणराशबरा अपि पापजीवाः । यद्यदभ्नुतक्रम- धंशयराशीलंशिक्तास्तियग्जना अपि किमु श्रतिधारणा ये ॥ ३॥ ( श्रीमद भागवत ) २ “दुसकन्त” नाम दुष्यन्त जिनकी स्त्री शकुन्तला-संशक प्रसिद्ध है । भक्किसुधास्वाद तिलक । श्यर् अकाशबृत्ति लइं है.। भूखे को न देखि सके, आब सो उठाइ देत नेति नहिं कर भूखें देह छीन भई हे | चालिस-ओ-आठ दिन पाछे जल अन्न आयो, दियो विप्र शूद्र नीच श्वान, यह नई है।हरि ही निहार उन मास, तब आए प्रभु भाए जग दुख जिते भोगों भक्ति छई है॥ ६०॥ ( ५३५ ) वात्तक [तलक | राजा दुष्यन्त के वंश में महाराज श्रीरन्तिदेवजी अतिजश्श्रय्ये प्रशंसनीय सन्त हुए कि जिन्होंने आकाशवृत्ति जीविका ग्रहण की । 'तिस पर भी उस आकाशवृत्ति में भी जो कुछ भोजन आ जाता था सो भी भूखों को दे दिया करते थे क्योंकि किसी को भूखा नहीं देख सकते थे। अपने लिये यत्र वा संचय नहीं करते थे अतएव भूख से शरीर अति दुबेल हो गया। एक बर अड़तालीस उपवास हो चुकने पर अन्न जल हरिकृपा से आया सो प्रथम एक भूखे ब्राह्मण को खिलाया. फिर उसके पौछे एक भूखे शूद्र को दिया; पुनः एक नीच को, और फिर शेष भूखे श्वान को खिला पिला दिया। यह. इनकी कृपालुता तथा समह्ृष्टि की नवीन रीति है, क्योंकि सबों में वे सर्वात्मा हरि ही को देखते थे। जब जलपगस्येन्त भी दे दिया और आप भूखे वरंच प्यास रह गये तबं इनकी दया और समदृष्टि देखके प्रभु ने आके दशन दिया परम कृताथे किया । प्रभु को प्रसन्न पा यह वर माँगा कि सब जीवमांत्र का दश्ख ही भोगू ओर वे सबके सब दुःखरहित हो जायेँ॥ प्रभु अति प्रसन्न हो उनको खत्री पुत्र तथा पृत्रवधू तीनों सहित विमान पर बेठाके निज लोक को ले गये॥ ऐसे विलक्षण सन्त थे तब तो उनकी भक्ति की महिमा जग में छा रही है॥ १ “आकाशत्ृत्ति”-ऐसी चत्ति कि जीविका के अथ कम चेष्ठा शन्य; पेसी वृत्ति कि जो कुछ अनाश्रित अकस्मात् ( बिना प्रबन्ध जेसे आकाश से जल ) आ जाचे, उसौ को लेन! ! २ “छीन'-च्यीण, खिन्न, दुबल ।
Hindi text from OCR scan (Khemraj Shrikrishnadas Prakashan, CC0). May contain errors.
